मैं और व्लादिक –
लेखक...
रात के ग्यारह बज चुके
हैं. मगर मैं और व्लादिक जाग रहे हैं. हम बड़े कमरे में मेज़ पे बैठे हैं, और अपनी नोटबुक्स से सिर नहीं उठा रहे हैं. हमारे ऊपर ढेर सारी प्लास्टिक
की लटकनों वाली एक छोटा सा लैम्प जल रहा है, और कभी-कभी इस
तरह के वाक्य सुनाई देते हैं: “मैं दूसरा भाग शुरू कर रहा हूँ” या “और मेरे पास
दूसरे चैप्टर में प्यार के बारे में होगा”.
ये हम नॉवेल्स लिख रहे
हैं. जब से व्लादिक पुरानी, भूरे रंग की नोटबुक लाया था,
जिसमें एक छोटी सी कहानी : “सर्दियों की तैयारी” लिखी थी, मेरा मन ‘सैनिक’ खेलने को नहीं
चाहता, और मैं प्लास्टीसिन से भी कुछ नहीं बनाना चाहता. पहले
तो मुझे अचरज हुआ, कि मेरे दिमाग़ में ख़ुद ही ये ख़याल क्यों
नहीं आया, कि एक नोटबुक ख़रीदकर उसमें जो चाहो वो लिखा जा
सकता है, और फिर ‘लेखकपन’ मेरा सबसे फ़ेवरिट काम बन जाता – हाँ, बेशक, फुटबॉल को छोड़कर. बस, मैं सिर्फ ऐसी फ़ाल्तू बातें
नहीं लिखता, जैसे “सर्दियों की तैयारी”. इस कहानी में सिर्फ
यही बताया गया है, कि अपनी ‘स्की’ज़ को कैसे चिकना बनाना चाहिए, जिससे वे अच्छी तरफ
फ़िसलें, और खिड़कियों को कैसे लुगदी से बंद करना चाहिए,
जिससे हवा भीतर न आ सके. व्लादिक लिखता है, कि
सबसे अच्छा तरीका है स्पंज से बंद करना. मगर ये दिलचस्प नहीं है, और सर्दियों की पूरी तैयारी व्लादिक ने सिर्फ डेढ़ पन्नों में लिख दी है!
मैंने तय कर लिया, कि अगर लिखूँगा, तो
एकदम नोवेल्स ही लिखूँगा.
मेरे पहले उपन्यास का
शीर्षक है “भूले उपनाम वाला”. इसमें इस बारे में लिखा है, कि कैसे एक लड़का बहुत ‘बोर’ हो
रहा था, वो हॉकी वाले सेक्शन में अपना नाम लिखवाने जा रहा था,
मगर रास्ते में कुछ कैनेडियन्स ने उस पर हमला कर दिया, उसे खूब मारा, और वो अपनी याददाश्त खो बैठा. आख़िर
में ये लड़का अपने नानू से मिलता है और उसकी याददाश्त वापस लौट आती है. व्लादिक,
जिसने “सर्दियों की तैयारी” के बाद कुछ और नहीं लिखा है, मेरा नॉवेल पढ़ता है, और फिर हम एक साथ लिखने लगते
हैं.
मैं तीन खण्डों का नॉवेल
“इवान – शिकारी का पोता” शुरू करता हूँ, और व्लादिक एक
थ्रिलर शुरू करता है “सबको ऐसा ही होना चाहिए”. जब तक वो अपना नॉवेल लिखता है,
मैं न सिर्फ अपना तीन खण्डों वाला नॉवेल पूरा कर लेता हूँ, बल्कि एक छोटा सा नॉवेल “गद्दार” भी लिख लेता हूँ.
फिर हम कई बार “एम्फ़िबियाई मैन” (भूजलचर मानव – अनु.) नाम की फ़िल्म देखते
हैं, और अचानक कई सारी किताबें तैयार हो जाती हैं. व्लादिक
की – “किरण–मानव”, और मेरी – “वायु–मानव”, “चुम्बक-मानव” और “धातुई मानव”. किरण-मानव सिर्फ आँखों से किसी भी सतह को
जला सकता है. वायु-मानव, अगर अपनी नाक में स्प्रिंग घुसा कर
छींके, तो कोई भी भयानक चक्रवात ला सकता है. चुम्बक-मानव
सोने को आकर्षित करता है, और धातुई मानव बस सिर्फ बेहद
शक्तिशाली और बेहद भला है. और इन सारे मानवों का बदमाश लोग अपने नीच कारनामों के
लिए उपयोग करना चाहते हैं, जिसमें, ज़ाहिर
है, वे कामयाब नहीं हो पाते.
व्लादिक को अपनी किताबों
में चित्र बनाना अच्छा लगता है, मगर मेरी ड्राइंग बुरी है,
मगर मेरी नोटबुक के मुखपृष्ठ पर हमेशा मूल्य, प्रकाशन
वर्ष, प्रतियों की संख्या और संक्षिप्त विवरण लिखा रहता है.
उदाहरण के लिए “दस अविजित” नॉवेल का संक्षिप्त विवरण इस तरह से है: “ डाकुओं,
समुद्री डाकुओं और अन्य लोगों के बारे में उपन्यास”. फिर मेरे सभी
नॉवेल्स व्लादिक के नॉवेल्स से ज़्यादा बड़े हैं. मेरा सबसे छोटा नॉवेल “सीक्रेट
प्लेस” ब्यानवे पृष्ठों का है, अगर अनुक्रमणिका को भी गिना
जाए तो, और व्लादिक के नॉवेल्स पचास-पचास, चालीस-चालीस पृष्ठों के हैं. मेरे लिए ये बेहद ज़रूरी है, कि नॉवेल लम्बा हो और कई खण्ड़ों में हो, क्योंकि तब
मुझे अनुक्रमणिका लिखना ख़ास तौर से अच्छा लगता है. कभी-कभी तो मैं पहले ही
अध्यायों के शीर्षक सोच लेता हूँ, अनुक्रमणिका लिख लेता हूँ,
और तभी नॉवेल की शुरूआत करता हूँ.
कुछ समय बाद व्लादिक ने
लिखना बंद कर दिया, क्यों कि, “वैसे
भी छपेगा तो कुछ भी नहीं”. पहले तो मैं व्लादिक से कहता हूँ,
कि कभी न कभी तो छापेंगे ही, और अगर ना भी
छापें, तो हमारी नोटबुक्स ख़ुद भी किसी किताब से कम नहीं हैं,
क्योंकि वहाँ कीमत है, प्रतियों की संख्या है,
मगर उसे किसी भी तरह मना नहीं सका.
अब मैं अकेला ही “बेलारूसी
लोक कथाएँ” लिख रहा हूँ.
मैं और व्लादिक – बिज़नेसमैन
हमारे शहर की सीमा पर, वहाँ, जहाँ ट्राम नंबर 3 मुड़ती है, अचानक एक कबाड़ी बाज़ार खुलता है.
वहाँ एक-एक रूबल में विदेशी च्युईंग गम बेचते हैं, और जैसे ही मेरे और व्लादिक के
पास पैसे जमा हो जाते हैं, हम वहाँ जाते हैं. कबाड़ी बाज़ार में च्युईंग गम के अलावा भी बहुत सारी चीज़ें
बिकती हैं, और मेरे दिमाग में ये ख़याल आता है, कि अगर आटे से बौने बनाए जाएँ, उन्हें गाढ़े रंग से रंगा जाए और
उन पर लाख का कवर चढ़ा दिया जाए, तो लोग उन्हें ख़ुशी से ख़रीद लेंगे. मैं व्लादिक को अपना आयडिया बताता हूँ, और थोड़ा बहुत मनाने के बाद हम
आटा, नमक, गाढ़े रंग और कवर के लिए लाख खरीदते हैं, जो बौनों के भी काम आ जाएगा.
कबाड़ी बाज़ार सिर्फ छुट्टियों वाले दिन ही लगता है, और शुक्रवार शाम को हम किचन को
प्रॉडक्शन-यूनिट में बदल देते हैं. हम बौनों को बेकिंग पैन में रखते हैं, आटे को खूब गरम करते हैं, फिर पैन बाहर निकालते हैं, बौनों को थोड़ा ठण्डा होने देते
हैं, इसके बाद उन्हें रंग देकर उन पर लाख चढ़ाते हैं. पूरे क्वार्टर में लाख की
गंध फैल जाती है, मगर कला के लिए कुर्बानी तो देनी ही पड़ती है!
कबाड़ी बाज़ार में जगह घेरने के लिए वहाँ चार बजे
पहुँचना होता है. इसलिए बौनों को चिंधियों वाले डिब्बे में करीने से सजाकर, जिससे कि उनमें से एक भी न टूटे, मैं और व्लादिक, अपनी नींद पूरी किए बिना पैदल
पूरे आधे-अंधेरे शहर से गुज़रते हैं, और हमसे सौ मीटर्स की दूरी पर, पीछे-पीछे तोन्या नानी चल रही है, जिससे मैं घबरा न जाऊँ. हम जगह
घेर लेते हैं, और हमारे बिज़नेस-पड़ोसी शुभ कामनाओं से हमारा स्वागत करते हैं, ज़ाहिर है, उनके दिलों में ये ख़याल भी नहीं
आ रहा था, कि हम उनका मुकाबला कर सकेंगे. वाकई में, इधर-उधर नज़र दौड़ाने के बाद, मुझे कुछ अटपटापन महसूस होने
लगता है, क्योंकि मेरा और व्लादिक का स्टाल बाकी स्टाल्स के मुकाबले में बहुत मरियल
लग रहा था. ज़रा सोचिए: बड़ा भारी स्टाल और उस पर खड़े हैं दस बौने, माचिस की डिबिया के साइज़ के, जबकि औरों के पास अपने सिल्क और
मखमल के लिए जगह कम पड़ रही है और उन्हें काफ़ी कुछ हाथों में भी रखना पड़ रहा है.
ऊपर से थोड़ी-थोड़ी देर में तोन्या नानी आकर व्लादिक से बौने ख़रीद रही है, क्योंकि मैं उसे नहीं बेच रहा
हूँ.
मगर फिर तोन्या नानी कहीं गायब हो जाती है, कबाड़ी बाज़ार अपने नाम के मुताबिक
शोर मचा रहा है, और मैं ज़ोर ज़ोर से चिल्लाकर और लोगों को मजबूर करके, अपने सारे बौने बेच देता हूँ. और
हालाँकि आख़िरी दो – एक रूबल में नहीं, जैसा कि हमने सोचा था, बल्कि पचास कोपेक में बेचता हूँ, फिर भी मैं बेहद ख़ुश हूँ.
व्लादिक हर संभव उपाय करता है, कि उसके बौनों की तरफ़ कोई न आए.
ठोढ़ी पर हाथ रखे वो ग्राहकों की तरफ़ पीठ करके बैठा है और ऐसा दिखा रहा है, जैसे उसे यहाँ किसी बेहद ख़ौफ़नाक
बात के होने का डर है. जब मैं अपनी चिल्ल-पुकार से किसी को आकर्षित करता हूँ, तो वो सिकुड़ जाता है और बस, स्टाल के नीचे ही नहीं घुस जाता.
हालाँकि उसकी बात भी समझ में आती है – क्योंकि अपने माल को बेचने के लिए जब मैं उन
लोगों का भी ध्यान अपनी तरफ़ खींचता हूँ, जो हाथ हिला देते हैं और दुहराते
हैं, कि उन्हें हाथियों में कभी भी दिलचस्पी नहीं रही.
“ये हाथी नहीं, बल्कि बौने हैं!” मैं जाने वालों
के पीछे चिल्लाता हूँ. “ये बेशकीमत हैं, जापानी कारीगरी 'नेत्सुके' से कम नहीं हैं, क्योंकि इन्हें हाथ से बनाया है
और बस एक-एक ही अदद बनाया गया है!!!”
ज़ाहिर, ये सब बर्दाश्त करना, हरेक के बस की बात नहीं है.
हम बौनों वाली बात दुहराना नहीं चाहते, मगर हमारा बिज़नेस चलता रहता है.
मैं रास्ते से कंकड इकट्ठा करता हूँ, उन्हें अच्छी तरह धोता हूँ, उन्हें पैकेट्स में बंद करता हूँ, और मण्डी की तरह चिल्ला-चिल्लाकर
बेचता हूँ, “एक्वेरियम के लिए बजरी, सीधे बायकाल झील की तली से”. ईमानदारी से कहता हूँ, कि मैं पाँच पैकेट्स बेचने में
कामयाब हो गया.
फिर
मैं और व्लादिक मछली-पालन का काम करते हैं, जिससे फ्राय-फिश पैदा करके उन्हें बेचें, मगर लगातार ‘गप्पीज़’ (रेनबो फ़िशेज़) ही पैदा होती हैं, और ज़ू-शॉप 'नेचर' में तो वैसी खूब हैं.
आइस्क्रीम का बिज़नेस बुरा नहीं चलता, मगर जब तक डिपार्टमेन्टल स्टोर
से बाज़ार तक आइस्क्रीम का बॉक्स ले जाते हो, आधी तो पिघल ही जाती है, और जो नहीं पिघलती, उसका कुछ हिस्सा बाद में पूरे
परिवार के साथ ख़ुद ही खाना पड़ता है.
घरेलू साबुन की आठ पेटियाँ एक सेकण्ड में ख़तम हो जाती
हैं, क्योंकि बाज़ार में साबुन कहीं है ही नहीं, मगर, अफ़सोस की बात है, कि नानू के गोदाम में सिर्फ आठ
ही पेटियाँ थीं.
तब व्लादिक की मम्मा अनुभवी सेल्समैन के समान ये
इंतज़ाम करती है कि हम चैरिटी-फ़ण्ड के लॉटरी टिकट्स बेचें. हम लेनिन स्ट्रीट पर
जाते हैं, जो हमारे शहर की मुख्य सड़क है, और दिन भर में एक तिहाई टिकट्स बेच देते हैं. ये बता दें, कि किसी ने भी कोई ख़ास इनाम नहीं
जीता, और हम तय करते हैं, कि अगर बचे हुए टिकट्स खोलें जाएँ, तो जीत की राशि, हमारी लागत से कहीं ज़्यादा ही
होगी. हम टिकट्स खोलते हैं.
अब ख़ास बात – चैरिटी फ़ण्ड का हिसाब समय पर पूरा करना
है, और तभी हम कोई नया बिज़नेस शुरू
कर सकते हैं...
फ़ुटबॉल-हॉकी....
“इस शैतान की वजह से मैं
अपने ही घर में प्रसिद्ध कलाकारों की कॉन्सर्ट नहीं देख सकता!” नानू बड़बड़ा रहे हैं, मगर फिर भी किचन में चाय पीने के
लिए चले जाते हैं, और
आख़िरकार मैं टी.वी. का चैनल बदल ही देता हूँ, मैं प्रोग्राम नं. 2 पर आता हूँ, जहाँ पंद्रह मिनटों से फुटबॉल चल
रहा है. “स्पार्ताक” – “दिनामो”(कीएव). दसाएव, चिरेन्कोव,
रदिओनोव, ब्लोखिन, बल्ताचा,
मिखाइलिचेन्को… और वो न जाने किन कलाकारों के
बारे में परेशान हो रहे हैं!
हमारे यहाँ सिर्फ एक
टी.वी. है, और इसलिए, फुटबॉल और हॉकी
के सारे मैचेस देखने के लिए, जो वैसे भी कभी-कभार ही दिखाए जाते हैं, मुझे चार
साल की उम्र से ही पढ़ना सीखना पड़ा. अख़बार में टी.वी. प्रोग्राम होता है – उसे ले
लो और ख़ुद ही देख लो कि कब टेलिकास्ट होने वाला है. और अगर मुझे पढ़ना नहीं आता,
तो कोई भी, इन झगड़ों के मारे, मुझे बताता नहीं, कि किसी कॉन्सर्ट के समय दूसरी
चैनल पर, मिसाल के तौर पर, यूरोपियन
क्लब का मैच दिखाया जा रहा है.
और मैं, सिर्फ देखता ही थोड़े हूँ. पहली बात, मैं इस बात पर
गौर करता हूँ कि कौन गोल बना रहा है, किस खिलाड़ी ने कितने
अंक बनाए हैं, और फिर, मेरी अपनी भी तो
चैम्पियनशिप मैच है, और वो सीधे बड़े कमरे में चल रही होती है,
जो टी.वी. में दिखाई जा
रही है, उसके बिल्कुल साथ साथ. जब फुटबॉल का मैच हो रहा होता
है, तो मैं कमरे में बॉल धकेलता हूँ, कमेन्ट्री
करता हूँ, बिल्कुल ओज़ेरोव या पेरेतूरिन की तरह; बाल्कनी का दरवाज़ा – गोल, और इस दरवाज़े को ढाँकने
वाला जाली का परदा, - गोल की जाली होती है. अगर टी.वी. पर ‘गोल’ हो रहा होता है, या कोई
ख़तरे वाली बात होती है, तो मैं अपना खेल रोक देता हूँ,
देखता हूँ, बाद में कालीन के सेंटर से शुरू
करता हूँ.
“प्रतासोव लेफ्ट फ्लैन्क
की ओर जा रहा है! पेनल्टी कॉर्नर में कैनपी बनाने की
ज़रूरत है!” यहाँ मुझे याद आता है, कि नेफ़्त्ची (फुटबॉल क्लब,
बाकू) के खिलाड़ी आज “द्नेप्र” के फुटबॉल प्लेयर्स के साथ बहुत गलत
खेल रहे हैं, एडी से गेंद को पीछे पीछे धकेलता हूँ, अपने आप को ही कमीज़ से पकड़ता हूँ और जहाँ तक संभव हो, विश्वसनीय तरीके से गिरता हूँ. “बेशक, पेनल्टी, प्यारे दोस्तों!!!” मगर रेफ़री न जाने
क्यों सिर्फ एक ही पीला कार्ड दिखाता है...
तभी तोन्या नानी आती है और
न जाने कौनसी बार कहती है, कि बाहर कम्पाऊण्ड में खेलना बेहतर
होगा. मगर मैं कम्पाऊण्ड में भी खेलता हूँ, और जानता हूँ,
कि वहाँ वो बात नहीं है. क्या वहाँ कमेन्ट्री कर सकते हो? ये सच है, कि जल्दी ही ये घर के अंदर वाली
चैम्पियनशिप्स बंद करनी पडेंगी, क्योंकि हॉकी का सीज़न शुरू
हो रहा है और चेकोस्लोवाकिया की टीम के साथ कमरे वाले मैच में फ़ेतिसोव ने इतनी ज़ोर
से बॉल फेंकी, कि झूमर टूट गया. ये कैफ़ियत, कि हमारी टीम के पास जीतने के लिए सिर्फ दो ही मिनट बचे थे, नानू को मंज़ूर नहीं है, इसलिए अब मैं सिर्फ टी.वी.
पर ही मैच देखता हूँ.
कोई बात नहीं, हॉकी का मैच सिर्फ देखने में भी मज़ा आता है. उसमें सब हमेशा लड़ते ही रहते
हैं! ख़ास तौर से इण्टरनेशनल मैचेज़ में. और वर्ल्ड कप मैचेज़, “इज़्वेस्तिया” अख़बार के पुरस्कार मैचेज़, कैनेडियन कप
के मैचेज़ – ये हम नानी तोन्या के साथ, और कभी कभी परनानी
नताशा के साथ भी देखते हैं. हमें सबसे ज़्यादा रेफ़रियों की नाइन्साफ़ी पर गुस्सा
करना अच्छा लगता है, जिन्हें कैनेडियन्स की और फ़िन्स की कोई
गलती दिखाई नहीं देती और जो हमेशा नाइन्साफ़ी से हमारे खिलाडियों को आउट कर देते
हैं. मेरी नानियाँ तो इतने तैश में आ जाती हैं, कि अगर हमारा
कोई खिलाड़ी कभी नियम तोड़ भी देता है, तो भी उन्हें कैनेडियन
का ही दोष नज़र आता है, और मुझे उनकी इस राय से सहमत होना न
जाने क्यों अच्छा लगता है, हालाँकि मुझे भी मालूम है,
कि हमारे खिलाड़ी पर गलती के ही लिए जुर्माना लगा है.
फिर अचानक हॉकी रात को
दिखाने लगते हैं. तोन्या नानी कोशिश करती है कि सोए नहीं, जिससे कि सुबह मुझे बता सके कि कैसा खेले थे. मगर तीसरे सेक्शन के शुरू
में वह ज़रूर सो जाती है, इसलिए सुबह उसे स्कोर का भी पता
नहीं चलता, और टी.वी. भी पूरी रात खुला रहता है.
तब मैं फ़ैसला करता हूँ, कि मैं ख़ुद ही मैचेज़ देखूँगा, और दिन में सो लिया
करूँगा, जिससे रात में आँख न लग जाए. अपने बिस्तर पर करवटें
लेता रहता हूँ, कभी-कभी तो डेढ़ घण्टा लेटा रहता हूँ, मगर एक सेकण्ड के लिए भी आँख़ नहीं लगती, फिर चाहे
कुछ भी हो जाए हॉकी का मैच ख़तम होने तक डटा रहता हूँ. वर्ना तो ये सारा करवटें
लेना बेकार ही जाता, और दिन में डेढ़ घण्टा सिर्फ पलंग पर
लेटे रहना – माफ़ कीजिए, मेरे बस की बात नहीं है! मगर जब
सोवियत संघ और स्वीडन के बीच मैच हो रहा हो, तो आख़िर तक कैसे
नहीं देखोगे? अगर पहले सेक्शन के बाद स्कोर 3:0 या 5:1 हो,
तो, मतलब ये हुआ कि हमारी टीम ज़रूर 10:1 से
जीतने वाली है. ऐसा, अगर ज़्यादा नहीं तो, करीब नौ बार हुआ. एक बार तो नानू भी रात को उठ गए,
और ये देखकर कि कैसे लगातार हमने स्वीडन के ख़िलाफ़ पाँच गोल बनाए,
गर्व से बोले:
“ऐसा होना चाहिए मैच! मुझे
भी दिलचस्पी हो गई.”
‘ज़रा ठहरो,’
मैं सोचता हूँ, ‘तुम्हारे आर्टिस्ट्स की
कॉन्सर्ट्स से बुरा तो नहीं है’.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें