मेरी नानी – तोन्या के नाम
इण्डियन फ़िल्म्स
(मेरे और व्लादिक के बारे
में, रिश्तेदारों और दोस्तों के बारे में,
गुज़रे हुए, अच्छे वक्त
के बारे में)
बिल्कुल-बिल्कुल
शुरूवात से...
वो
फ़ोटो, जिसमें सात महीने के मुझको तोन्या नानी ऊपर छत की तरफ़ उठा रही है, और
मैंने सीने पर तीन चमकदार सितारों वाली सफ़ेद 'ओवरआल' पहनी
है, मामा के दोस्त हैनरी आरोनोविच ने खींची थी. नानी ने बताया था, कि
उसने ख़ुद ही उस दिन आकर मुझ नन्हे की तस्वीर खींचने प्रस्ताव रखा था. और कई सालों
के बाद हैनरी आरोनोविच ने मुझे तीन टैन्कर्स के बारे में गाना सुनाया था. मुझे
इतना अच्छा लगा,
कि बाद में मैंने इस गाने को याद कर लिया और उसे गाया भी
था. मैं “तीन टैन्कर्स” के बारे में गाता था, एरोड्रोम
के बारे में गाता था,
जहाँ “किसी के लिए तो ये सिर्फ उड़ान का मौसम है, मगर
असल में है प्यार को बिदाई”, मगर ख़ास तौर से – “अगर दोस्त निकले अचानक...”
गाता था.
नानी
मज़े से बताती है कि कैसे उसके मिलिट्री यूनिट वाले ऑफ़िस में आया, उस
कमरे में गया जहाँ टाइपिस्ट-लड़कियाँ बैठी थीं, और ज़ोर से गाने लगा : “अगर
दोस्-स्त निकले अच्-चानक...” नानी को मेरी वजह से बहुत अटपटा लग रहा था – मैं इतनी
ज़ोर से और सही-सही गा रहा था. इसलिए दूसरा स्टैंज़ा शुरू करते ही उसने अपनी साथी
टाइपिस्ट स्पिरीना की ओर देखते हुए, जो बनावटी ढंग से मुस्कुरा
रही थी, कहा: “सिर्योझेन्का,
तूने पूरा तो गा लिया!” मैंने जवाब दिया: “पूरा कैसे गा
लिया, जबकि अभी दो और स्टैंज़ा बाकी हैं?!” और
मैं गाता रहा: “अगर नौज्-जवान पहा-आड़ पे – करे ना – आह, घबराए
अचानक और नीचे...” और इस तरह आख़िर तक गाता रहा. कोई बात नहीं, स्पिरीना
बर्दाश्त करती रही और मुस्कुराती रही. वो अब कहाँ होगी?
नानी
के ऑफ़िस के बाद हम अक्सर बेकरी चले जाते थे, जो हमारी ही बिल्डिंग में थी.
बेकरी में सब हमें जानते थे – वहाँ भी मैं, ज़ाहिर था, ऊधम
मचा रहा था, मगर सेल्सगर्ल्स मुझसे बहुत प्यार करती थीं. जैसे ही हम अंदर घुसे, मैं
ये कहते हुए कि “जाऊँ,
दे-ए-खूँ, सब कुछ ठी-ईक तो है!” सीधे उस जगह गया, जहाँ
ब्रेड रखी जाती है,
मतलब जहाँ खरीदने वालों को जाना मना है. वहाँ से जब मैं
बाहर निकला तो बदन पर सिर से पाँव तक सूखे टोस्ट और रिंग वाली
ब्रेड लटक रही थी,
मैंने रिपोर्ट दी: “सब ठी-ईक है!” सिर्फ मेरी नानी तोन्या
को ठीक नहीं लग रहा था,
क्योंकि उसे इतने सारे सूखे टोस्ट खरीदने ही नहीं थे.
सेल्सगर्ल्स हँस रही थीं और कह रही थीं, कि
वो मुझे ये सारे टोस्ट्स और रिंग वाली ब्रेड्स बेचने को तैयार हैं. मगर मुझे रिंग
वाली ब्रेड्स थोड़े ही न खरीदनी थी, मैं तो सिर्फ “दे-एखना चाहता
था, सब ठी-ईक तो है”,
और मैंने अपने बदन से सारी रिंग ब्रेड्स निकाल दीं, तोन्या
नानी को उनके पैसे देने से बचा लिया.
औषधीय जड़ी-बूटियों का
संग्रह...
मैं भाई के साथ तुखाचेव्स्की भाग की पाँचवी फार्मेसी
के पास बेंच पर बैठा हूँ. बगल में दो बैग्स पड़ी हैं. उनमें फ़ोल्ड की हुई बड़ी-बड़ी
थैलियाँ, बड़ा किचन वाला छुरा (ये व्लादिक के बैग में, और
मेरी बैग में – हँसिया), थर्मस और सैण्डविचेस हैं. हम बस का इंतज़ार कर रहे
हैं, जिससे
कि शहर से बाहर जाकर बिच्छू-बूटी इकट्ठा कर सकें.
कुछ दूरी पर पुराने जैकेट्स पहने और सिर पर रूमाल
बांधे फार्मासिस्ट(दवासाज़) लड़कियाँ खड़ी थीं और हँस रही थीं (औषधीय जड़ी-बूटियों को
तैयार करना उनका काम होता है). जल्दी ही बस आती है और ड्राइवर वीत्या इंजिन शुरू
करते हुए कहता है : “राचेव्का जा रहे हैं”. और जब हम जा रहे होते हैं, तो
दवासाज़ लड़कियाँ और एक हाथ वाला नानू (हालाँकि उसका एक ही हाथ है, मगर
वो मुझसे दुगनी बिच्छू-बूटी इकट्ठा करता है) कहेंगे, कि हम कितने अच्छे हैं, जो अपनी फिल्म और आइस्क्रीम का पैसा ख़ुद ही कमा लेते हैं. न जाने क्यों उन्हें ऐसा
लगता है, कि
फिल्म और आइस्क्रीम के अलावा हमें ज़िंदगी में किसी और चीज़ की ज़रूरत ही नहीं है. उन्हें
बताना ही चाहिए, कि कैसे मैं अच्छी ग्रेड से पास हुआ हूँ, कैसे मुझे इसके लिए पच्चीस रूबल्स इनाम में दिए गए, जिन्हें मैं उसी दिन
ऑनलाइन ताश के खेल - शीपा में हार गया. अगर किसी को मालूम नहीं है, तो बताता हूँ, कि ये एक ताश का खेल होता
है. मगर मैं कुछ भी नहीं कहता, क्योंकि अगर किसी को पता चल गया कि मैं पैसे लगाके ताश खेलता हूँ , तो... मतलब, कुछ भी अच्छा नहीं होता.
अगले
दिन, जब हम फिर से पाँचवीं
फार्मेसी के पास बस का इंतज़ार करेंगे (और तब मेरी बैग में हँसिए के बदले बड़ा चाकू
पड़ा होगा, क्योंकि
हँसिए से बिच्छू-बूटी काटने में तकलीफ़ होती है, हालाँकि बढ़िया कटती है), तो अचानक बारिश होने लगेगी. बारिश में तो कोई भी जड़ी-बूटियाँ इकट्ठा करने
नहीं जाता, और
हम ख़ुश हो जाएँगे, कि घर वापस जा सकेंगे और तोन्या नानी के पास बैठकर सैण्डविच के साथ चाय
पियेंगे. व्लादिक हाल ही में पढ़ी हुई कोई फ़ैन्टेसी वाली किताब के बारे में बताएगा
और मैं और तोन्या कुछ भी न समझ पाएँगे और सिर्फ हँसते रहेंगे, जिससे व्लादिक को खूब
गुस्सा आयेगा. आख़िर में हमारे बीच समझौता करवाती है फ़िल्म “मुँहतोड़
शिकारी टिड्डे”, जो, पता
चलेगा, कि आज ‘स्मेना’ थियेटर में दिखाई जा रही है. उसमें ये ग़ज़ब का कुंग-फू है! और हीरो का नाम भी
है ‘चाय’. व्लादिक मुझे ये फ़िल्म
दिखाने ले गया था, और वो ऐसी फ़िल्म थी, जिसे हम कम से कम तीन-चार बार ज़रूर देखते थे. तो हम ‘स्मेना’ जाते हैं, फिर, जब
“मुँहतोड़
शिकारी टिड्डे” ‘जुबिली’ थियेटर में लगेगी, - तो ‘जुबिली’ भी जाएँगे, और फिर मेरे दिल में एक
नया आइडिया आएगा, कि क्या करना चाहिए: ख़ुद ही एक्वेरियम्स बनाएँ और उन्हें दर्जनों में
बेचेंगे. स्कूल के ग्रीन हाउस से हम कुछ काँच चुरा लेंगे, एपोक्साइड- ग्लू
खरीदेंगे, जिससे
काँच चिपकाए जा सकते हैं, और ऐसी साधारण सी चीज़ बनाएँगे, जैसी बाज़ार में अब तक कभी आई ही नहीं होगी. मगर हम अपनी चीज़ बेचने के लिए
नहीं ले जाएँगे.
इण्डिया, दो सिरीज़.....
पहली
इण्डियन फ़िल्म, जो मैंने देखी, वो थी फ़िल्म ‘सम्राट’. फिल्म देखने के बाद मैं लड़खड़ाते हुए, खुले हुए मुँह से, अपने चारों ओर की कोई भी चीज़ न देखते हुए और लगातार गलत जगह पर मुड़ते हुए घर जा रहा था और क्वार्टर के अंदर जाते
ही मैंने कहा:
“तोन्, क्या तुझे पता है, कि हिटलर से भी ज़्यादा
बुरा कौन है?”
“अरे,” तोन्या नानी ने अचरज से
पूछा, “ये हिटलर से भी
ज़्यादा बुरा आख़िर कौन है?”
कुछ
देर चुप रहने के बाद और हौले-हौले दूर के मुम्बई से घर आते हुए, मैंने कहा:
“बॉस.”
बेशक!
वो हिटलर से कई गुना बुरा है, क्योंकि उसने कैप्टेन चावला को कई सालों तक तहख़ाने में कैद करके रखा था. कैप्टेन चावला अकेला ही
ऐसा आदमी था, जो उस जगह को जानता था, जहाँ उसने सोने से लदे हुए जहाज़ ‘सम्राट’ को समंदर में डुबाया था! और डुबाया भी उसी बॉस की आज्ञा से था! और अगर फिल्म
के ख़ास हीरो राम और राज न होते, तो न जाने और कितने साल वो बुरे काम करता रहता!
मैं
व्लादिक को विस्तार से ‘सम्राट’ की कहानी सुनाता हूँ, और हमने फ़ौरन उसे देखने का फ़ैसला कर लिया. व्लादिक को भी फ़िल्म बहुत अच्छी
लगती है, मगर
सिर्फ जब हम थियेटर से बाहर निकल रहे थे, तो उसने कहा, कि आख़िर में बॉस पे सिर्फ तीन गोलियाँ चलाई गई थीं, न कि बीस, जैसा मैंने उसे बताया
था. मगर मुझे लगा था, कि बीस थीं!
और
उसके बाद मैंने लगातार एक के बाद एक “तकदीर”, “जागीर”, “हुकूमत”, “शोले”, “मुझे इन्साफ़ चाहिए!” -
ये फ़िल्में देखीं और अब मुझे मालूम है, कि वो, जो “सम्राट” में राम का रोल कर रहा था, - वो एक्टर धर्मेंद्र है, “शोले” में वो वीरू का रोल कर रहा था, और वो जो बॉस बना था, - वो अमजद ख़ान है, वो “शोले” में वैसे ही घिनौने आदमी का रोल कर रहा था, सिर्फ इस बार उसका नाम
है गब्बर सिंग. फिर मैंने “शक्ति”, “ख़ुद्दार ”, “मुकद्दर का सिकंदर”, “त्रिशूल”, “जंज़ीर” देखी और मैं अमिताभ बच्चन से प्यार करने लगा, जो इन सभी फ़िल्मों में
और, “शोले” में भी
प्रमुख रोल करता है, और सभी में उसका नाम विजय ही है. अगर मुझे कभी लड़का हुआ, तो मैं उसका नाम भी विजय
ही रखूँगा, अमिताभ
के सम्मान में.
फिर
थियेटर्स में राज कपूर की “आवारा” और “डिस्को डान्सर” दिखाई जाती हैं. मेरे लिए ‘इण्डिया, दो सिरीज़’ का मतलब है, कि मुझे जाना ही पड़ेगा, क्योंकि फ़िल्म अच्छी ही होगी, और मैं फ़ौरन ये दोनों फ़िल्में देखने के लिए लपकता हूँ. “आवारा” तो मुझे बेहद
पसंद है. मगर चार बार “डिस्को डान्सर” देखने के बाद (उसमें हीरो है मिथुन
चक्रवर्ती – ये वो ही है, जिसने “जागीर” में फ़ैक्ट्री मालिक रणधीर के छोटे भाई का रोल किया था) मैं
अच्छी तरह समझ गया हूँ, कि जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो एक्टर ही बनूँगा, और “डिस्को डान्सर-2” में काम करूँगा, मिथुन चक्रवर्ती के साथ. और, अचानक “डिस्को डान्सर – 2” आ जाती है! मगर इस फ़िल्म का नाम है “डान्स
डान्स!” मुख्य रोल भी मिथुन चक्रवर्ती ने ही किया है, डाइरेक्टर भी वो ही बब्बर सुभाष है, वो ही ऑपरेटर राधू करमाकर है, वो ही म्यूज़िक डाइरेक्टर बप्पी लहरी है! जब मैंने ‘वर्कर्स वे’ में ‘सव्रेमेन्निक’ थियेटर की अनाउन्समेन्ट
और ये वाक्य देखा: “...फिल्म “डिस्को डान्सर” के चाहने वाले सोवियत फ़ैन्स के लिए”, तो पाँच मिनट के लिए मैं
जैसे ख़ुशी से मर ही गया. और न जाने क्यों ये भी ख़ास तौर से अच्छा लगा कि “डिस्को
डान्सर” को सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि सभी सोवियत दर्शक पसंद करते हैं!
फिर
एक समय ऐसा भी आता है, जब हमारे शहर के थियेटर्स में इण्डियन फिल्म्स आती ही नहीं हैं. तब मैं ‘09’ इस नंबर पे शहर के
सिनेमा-डिस्ट्रीब्यूटर ऑफ़िस में फ़ोन करता हूँ, और पूछता हूँ, कि क्या कोई नई इण्डियन फ़िल्म दिखाई जाने वाली है. मुझे जवाब मिलता है कि
जल्दी ही फ़िल्म “प्यार करके देखो” आने वाली है और रिसीवर रख देते हैं. मैं पूछ भी
नहीं पाता कि फ़िल्म में कौन-कौनसे एक्टर्स हैं.
फिर से फ़ोन करता हूँ, पूछता हूँ, कि फ़िल्म “प्यार करके देखो” का हीरो कौन है. मुझे मालूम तो होना चाहिए ना कि
किसे पसंद करूँ और किस पर यकीन करूँ! उन्हें बहुत अचरज होता है, कि मुझे इस बात में
दिलचस्पी है, मगर फिर भी टेलिफ़ोन वाली औरत ने हँसकर कहा, कि जब फिल्म दिखाई जाएगी, तो मुझे पता चल जाएगा, कि उसमें कौन-कौन काम कर रहा है. मगर मुझे उसका लहजा अच्छा नहीं लगा. मैं
फिर से फोन करता हूँ, और आवाज़ बदलकर पूछता हूँ, कि कहीं किसी थियेटर में “डिस्को डान्सर” तो नहीं दिखाने वाले हैं. मुझे
मरियलपन से जवाब मिलता है, कि नहीं दिखाएँगे.
जब
अगली सुबह मैं फिर से हमारे शहर के थियेटरों में इण्डियन फ़िल्म्स दिखाने के बारे
में फ़ोन करता हूँ, तो वो लोग मुझे पहचान लेते हैं:
“दोस्त, तू क्या नींद में भी सोच
रहा था, कि
कहाँ फ़ोन करना है?”
अब
मैं उन्हें फोन नहीं करता. अच्छा नहीं लगता. मगर, ये मैं उनका दोस्त कैसे हो गया?!
मैं और व्लादिक....
फ़िल्में बनाते हैं.....
जल्दी ही मुझे ऐसा लगने
लगा, कि सिर्फ इण्डियन फ़िल्म्स देखना ही काफ़ी नहीं है. मैं ख़ुद उन्हें बनाना
चाहता था, इस तरह, कि मैं उनमें मुख्य
भूमिकाएँ करूँ, ख़ुद ही डाइरेक्टर, स्क्रिप्ट
राइटर, और गायक बनूँ. मैं शौकिया मूवी-कैमेरा के लिए पैसे
इकट्ठा करने लगता हूँ, हालाँकि ये बात मैं सोच नहीं पा रहा
हूँ, कि शूटिंग कैसे होगी और, ख़ास बात,
हमारी फ़िल्में देखेगा कौन. जैसे जैसे मैं सोचता जाता, मेरी घबराहट बढ़ती जाती और मैं निराश होने लगा. मगर अचानक व्लादिक मुझे फ़िल्में
बनाने का एक बढ़िया तरीका समझाता है, जिसमें किसी
कैमेरे-वैमेरे की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ आपको ड्राइंग आनी
चाहिए.
वो कागज़ के एक टुकड़े पर एक
आदमी बनाता है,
दूसरे पर – वैसा ही आदमी जिसके हाथ ऊपर उठे हैं, पहले कागज़ को दूसरे के ऊपर रखता है और तेज़ी से उसे हटा लेता है. आदमी हाथ
उठा रहा है! क्या बात है! मैं भाग कर डिपार्टमेन्टल स्टोअर में जाता हूँ और सर्दियों
में खिड़कियों पर चिपकाने वाले कागज़ के बहुत सारे रोल्स लेकर आता हूँ. ये हमारी रील
है. खडे डैशेस से मैं फ़्रेम्स के निशान बनाता हूँ, और
ड्राइंग करने लगता हूँ.
लगन से लोगों के चित्र
बनाना मेरे बस की बात नहीं है, इसलिए “बदला” नाम की फ़िल्म की दूसरी सिरीज़ आते
आते मेरे सारे हीरोज़ एक जैसे लगने लगते हैं, सिर्फ कपडों के
रंग से ही उन्हें पहचाना जा सकता है. खलनायकों को मैंने बड़ा बनाकर दिखाया है,
और उनके चेहरे पर दो मोटी-मोटी लकीरों से झुर्रियाँ ज़रूर बनाई हैं,
जिससे उन्हें पहचानना मुश्किल न हो.
शाम तक फ़िल्म बन गई. मैं
एक डिब्बे में दो खड़े छेद बनाता हूँ, उनमें अपनी फ़िल्म “बदला” की पहली
और इकलौती कॉपी फ़िट करता हूँ, और व्लादिक पहला और इकलौता
दर्शक बनता है. अगर कागज़ की इस रील को ठीक से खींचा जाए, तो
डिब्बे के स्क्रीन के सामने वाले हिस्से में तस्वीरों वाले लोग घूमने लगते हैं,
लड़ने लगते हैं, और डान्स करने लगते हैं. ख़ैर,
फ़िल्म में आवाज़ मुझे ख़ुद को देनी पड़ती है.
फ़िल्म शो के बाद व्लादिक
भी सर्दियों में खिड़कियों पर चिपकाने वाला कागज़ ख़रीदता है और कुछ दिनों के बाद
उसकी पहली फ़िल्म “बवण्डर” का प्रीमियर होता है.
धीरे धीरे हम फ़िल्म
निर्माण के काम में डूब जाते हैं. व्लादिक धारावाहिक फ़िल्म “12-निन्ज़ास” बनाता है, जो
“बवण्डर” ही के समान कुँग फू के दो प्राचीन स्कूलों के बीच की दुश्मनी के बारे में
बताती है. वो एक नई चीज़ शामिल करता है: हीरोज़ के डायलॉग रील पर लिखता है, जिससे कि हर फ़्रेम के उनके डायलॉग को याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
जब तक व्लादिक “12–निन्ज़ास”
बना रहा था (अपनी फ़िल्म बनाने में उसे करीब एक महीना लग गया), मैंने
एकदम अपनी कई सारी फ़िल्में रिलीज़ कर दीं : “पराए नाम से”, “डान्सिंग
रेनबो”, “जनता की भलाई के लिए”, “ख़तरनाक
बीमारी”, “अपूरणीय क्षति”, “गाँव का
रक्षक”, “वापसी”, और “मास्टर दीनानाथ
का संगीत”. दर्शकों की अनुपस्थिति की समस्या भी धीरे धीरे हल हो रही थी. व्लादिक
के मम्मी-पापा और हमारे सारे दादाओं और दादियों ने बिना विरोध किए हमारी फ़िल्में
देखीं.
मगर फ़िल्में दिखाते-दिखाते
समझ में आया,
कि मुझे ख़ास ख़ुशी तब होती है, जब रील फट जाती
है, क्योंकि तब ठीक वैसा ही होता है, जैसा
असली थियेटर में होता है. रील अपने आप तो नहीं फ़टती है, और
मैं हर एक मिनट बाद, दुर्घटनाओं के चित्र दिखाते हुए,
उसे फाड़ देता हूँ और ऊपर से बड़बड़ाता हूँ, कि
बुरी कॉपी लाए हैं.
नतीजा ये हुआ कि लोगों ने
हमारी फ़िल्में देखना बंद कर दिया, और फिर मैं भी तो फ़िल्मों के लिए ड्राइंग्स
बनाते बनाते बोर हो गया हूँ.
कुछ भी कहो, सचमुच की
इण्डियन फ़िल्म्स बेहतर होती हैं!
कोई बात नहीं. समय के साथ
साथ मैं कुछ और सोच लूँगा!
मेरी परदादी - नताशा
शाम को मुझे बाहर से घर
लाना बेहद मुश्किल है,
ख़ासकर जब सर्दियाँ हों और हॉकी का खेल चल रहा हो. टेप लिपटी अपनी
स्टिक “रूस” लिए मैं एक गोल से दूसरे की तरफ़ जाता हूँ ( हमारे गोल – लकड़ी के
डिब्बे हैं, जो सब्ज़ी की दुकान के पास पड़े रहते हैं),
कानों को ढाँकने के लिए फ्लैप्स वाली टोपी, टीले
पर फ़िंकी है, जिससे वह आँखों पे न सरक आए, और खिड़की से आती हुई चीख, कि घर लौटने का वकत हो गया
है, क्योंकि अँधेरा हो गया है, सुनाई
ही नहीं देती.
मगर रात के दस बज चुकेहैं, और मेरी
परनानी नताशा बाहर पोर्च में आती है और मुझे मनाती-पुचकारती आवाज़ में बुलाती है:
“सिर्योझेन्का-आ!
चल घर जाएँगे, नानू आए हैं. और वो क्या लाये हैं!
आय-आय-आय-आय!...”
मुझे दोस्तों के सामने शरम
आती है, कि नानू की गिफ्ट हॉकी से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है, मगर फिर भी रुक जाता हूँ और नताशा की तरफ़ देखता हूँ.
“क्या लाए हैं?”
“ओय, वो ख़ुद ही
तुझे दिखाएँगे, चल, जाएँगे.”
वाकई में, दिलचस्प
बात है, कि नानू क्या लाए हैं, - हो
सकता है, दलदल से बेंत लाए हों, मैं जो
कब से माँग रहा हूँ. मगर, वैसे मौसम तो सर्दियों का है,
अब कहाँ से होने लगी दलदल?
अपने प्रवेशद्वार में
घुसते हैं. मैं आगे आगे,
नताशा मेरे पीछे. हम दूसरी मंज़िल पे रहते हैं, ज़्यादा नहीं चलना पड़ता, मगर मैं फिर पूछ ही लेता हूँ
कि नानू क्या लाए हैं. और तब, इस बात को समझते हुए कि अब मैं
उछलकर बाहर सड़क पर नहीं जा सकता, क्योंकि वह मेरा रास्ता
रोके हुए है, नताशा का चेहरा फ़ौरन बदल जाता है, और किसी युद्धबन्दी की तरह मुझे पीठ से धकेलते हुए, वो
धमकाती है:
“चल! शैतान गुड़िया! क्या
लाए हैं! इसे घर लाना मुसीबत है! देख, तेरी स्टिक तो मोड़ पे चटक गई है –
नई नहीं खरीदूँगी!!!”
मगर फिर भी मैं अपनी
परनानी से बेहद प्यार करता हूँ. जब फराफोनवा (मेरी लोकल डॉक्टर) पहली बार हमारे घर
आई, तो उसने मुझे देखा और बोली:
“ओय, कितनी
प्यारी बच्ची है!”
और मैं स्कर्ट-ब्लाऊज़ में
था, सिर पर रूमाल बंधा था – मतलब, नताशा की हर चीज़ पहनी
थी.
“मैं लड़की नहीं हूँ!” मैं शरमा
गया.
“तो फिर तू कौन है, लड़का?”
“न तो लड़की और ना ही लड़का!
मैं परनानी नताशा हूँ,
और मेरी उम्र पचहत्तर साल है!”
अब फ़राफ़ोनवा ने, संजीदगी
से तोन्या नानी को समझाया, कि मुझे स्कर्ट पहनने न दिया जाए,
क्योंकि मुझे इसकी आदत हो जाएगी, और मेरी
मानसिकता पर असर पड़ सकता है, मगर तोन्या नानी ने अफ़सोस के
साथ जवाब दिया, कि मुझे ऐसा करने से रोकना संभव नहीं है और
अगर बात सिर्फ स्कर्ट तक ही रहती तो कोई बात नहीं थी, मगर
मैंने तो नताशा के सारे बर्तन ले लिए हैं, और उसीकी दवाएँ
खाता हूँ, ब्लड प्रेशर की, चक्कर आने
की, और दिल की...(मगर मैं कोई सचमुच की दवाइयाँ नहीं खाता,
बल्कि मटर के दाने, चॉकलेट्स खाता हूँ और
आँखों में भी दवा के नहीं, बल्कि सिर्फ पानी के ड्रॉप्स
डालता हूँ).
और नताशा तो मुझसे बेहद
प्यार करती है. एक बार शाम को वह “नन्हा उकाब” बाइसिकल ले आई.
मेरे पास “स्कूल बॉय” थी, और उसे
मालूम था, कि मुझे एक बड़ी साइकिल चाहिए. बस, ले के आ गई. “ओह, सीढ़ियों से मुश्किल से खींच के
लाई!”
शोर सुनकर तोन्या नानी
किचन से बाहर आई.
“ये क्या है?”
“अरे, मैं
मिलिट्री स्टोर के पास से जा रही थी – ये वहाँ खड़ी थी. आधा घण्टा खड़ी रही, घण्टा भी हो गया, कोई लेने नहीं आया. चलो, सिर्योझा की हो जाएगी.”
“मम्मा,” तोन्या
नानी ने कहा, “तुम बिल्कुल पगला गई हो. किसी ने इसे वहाँ रखा
था! तुम ख़ुद भी नहीं जानतीं, कि क्या करना चाहिए. वापस ले
जाओ.”
और नताशा साइकिल को वापस
रखने चली गई. अफ़सोस,
कि तोन्या नानी घर में थी, वर्ना तो “नन्हा
उकाब” मेरे ही पास रहती!
समर कॉटेज.
त्यौहार के दिन और रोज़मर्रा के दिन...
नानू
शेड के पास बेंच पे बैठे हैं. उनके सामने तामचीनी की बाल्टी थी, जिसमें प्याज़ और माँस था. वो कबाब बना रहे हैं, और मैं और व्लादिक अलाव में टहनियाँ जलाकर आंगन में घूम रहे हैं. ये हमारी
मशालें हैं. वो जल्दी से बुझ जाती हैं, और हम उन्हें फिर से जलाने के लिए अलाव के पास जाते हैं. वो फिर से बुझ जाती
हैं, और हम तय करते हैं, कि चलो, इन्हें तलवारें बना लेते
हैं. हम लड़ना शुरू करते हैं. व्लादिक जीत जाता है, क्योंकि वह जीतना चाहता है, और मैं ये चाहता हूँ, कि युद्ध ख़ूबसूरत हो.
ये विजय-दिवस (9 मई –
अनु.) है,
जो हम अपनी समर कॉटेज में मना रहे हैं.
तोन्या नानी घर के अंदर तरह तरह के सलाद बना रही है. जल्दी ही व्लादिक के
मम्मी-पापा आ जाएँगे, नानू के दोस्त इलीच और वीत्या भी आएँगे,
जो नानू को ‘मेरे बाप’ कहता
है. और, नीली “ज़ापरोझेत्स” कार में दादा वास्या और दादी नीना
भी आएँगे, जो व्लादिक के दादा-दादी हैं.
दादा वास्या के साथ फुटबॉल
पर बहस करना अच्छा लगता है,
क्योंकि वो भी सारे मैचेस देखते हैं; और वो
मुझे इसलिए भी अच्छे लगते हैं, कि हालाँकि वो सत्तर साल के
हैं, मगर हमेशा इस्त्री किया हुआ सूट पहनते हैं, बढ़िया टाई लगाते हैं, उनके बाल हमेशा पीछे की ओर
करीने से कढ़े रहते हैं, और एक भी बाल बिखरता नहीं है,
चाहे दादा वास्या कुलाँटे ही क्यों न मारें.
मगर मेरे नानू, जिन्हें
भी मैं बहुत प्यार करता हूँ, हमेशा कोई सलवार पहने रहते हैं,
एक ही, पुराने ज़माने की खाकी रंग की कमीज़ और
हल्की पीली चीकट कैप लगाए फिरते हैं, जिसे मेरे पैदा होने से
बहुत पहले उन्होंने किसी रिसॉर्ट पे ख़रीदा था.
लोगों ने मेरे नानू को
लेदर की, कॉड्रोय की, ऊनी कैप्स दी थीं, और इलीच तो हमेशा पूछता है कि आख़िर वो “अपनी इमेज कब बदल रहे हैं”,
सब बेकार. नई कैप्स का ढेर अलमारी में पड़ा है, मगर नानू अपनी उसी हल्की-पीली, फ़ेवरिट कैप में घूमते
हैं. और न सिर्फ समर कॉटेज में, बल्कि फ़ार्मेसी के गोदाम में
भी, जहाँ वो डाइरेक्टर हैं.
त्यौहार पूरे जोश पे है.
इलीच मुझे नन्हा पिग्लेट कहता है, और इससे मुझे बहुत गुस्सा आता है. नानू और
वीत्या बहस कर रहे हैं, कि वास्या की “ज़ापरोझेत्स” के लिए
टायर्स कौन जल्दी लाएगा, वर्ना दादा वास्या तो शिकायत कर रहे
थे, कि वो – कब के चिकने हो चुके हैं. जब से हमारे कम्पाऊण्ड
में एक ही पत्थर पे दादा वास्या के लगातार तीन टायर्स पंक्चर हो गए थे, मेरे नानू हर बात में उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं.
और अचानक बारिश होने लगती
है. हम घर के अंदर भागते हैं; कुर्सियाँ मुश्किल से ही सबके लिए हैं, मगर किसी तरह बैठ जाते हैं और बिगड़े टेलिफोन का खेल खेलने लगते हैं. इलीच
सबसे ज़्यादा हँसता है, हालाँकि पता चल रहा है, कि उसे वाकई में मज़ा नहीं आ रहा है. व्लादिक के पापा, इससे उलटे, जानबूझकर नहीं हँसते, जिससे ये ज़ाहिर करें कि – बिगड़ा हुआ टेलिफ़ोन कितना बेवकूफ़ खेल है – उसके
मुकाबले, जैसे मिसाल के तौर पे, चैज़ के
लेखों के संग्रह के, जिसके दो खण्ड वो साल भर से हर महीने
ख़रीदते हैं. और मैं चाहता हूँ, कि सब लोग रात में कॉटेज में
ही रुक जाएँ. इसके लिए ये ज़रूरी है, कि बारिश सुबह तक होती
रहे, वर्ना पता नहीं, कि सब लोग
रुकेंगे या नहीं.
मगर जल्दी ही सूरज निकल आया, और हम
अपने-अपने घर जाने के लिए निकले. दादा वास्या मुझे “ज़ापरोझेत्स” में घर छोड़ने के
लिए तैयार हो गए. जैसे ही वो स्पीड बढ़ाते हैं, मैं सीट से
आगे झुकता हूँ, और इंजिन की आवाज़ से भी ऊँचे, उम्मीद से पूछता हूँ:
“वास्, अब तू
कहीं घुसा देगा, हाँ?! (ख़ैर, ये तो मैं यूँ ही मज़ाक कर रहा हूँ).
“छिः, तू गंदा
यूसुफ़!” दादा वास्या फुफकारते हैं और गाड़ी धीरे चलाने लगते हैं.
यूसुफ़ क्यों – सिर्फ ख़ुदा
ही जानता है.
और दिनों में सिर्फ मैं और
तोन्या नानी ही समर कॉटेज जाते हैं. कभी कभी व्लादिक भी आ जाता है, मगर आजकल
उसका एक दोस्त पैदा हो गया है – ल्योशा सकलोव, जिसकी वो इतनी
हिफ़ाज़त करता है, कि मुझे भी उससे मिलवाने में शरमाता है. बात
सही है, अगर अचानक मैं बोल दूँ कि हमने खिड़कियाँ चिपकाने
वाले कागज़ पर कैसे फ़िल्में बनाई थीं, तो?
मतलब, मैं और
तोन्या पहाड़ी पर जाते हैं, फिर बास मारती नदी के ऊपर का पुल
पार करते हैं, और वहाँ से समर कॉटेज बस दो हाथ की दूरी पे
है. हम अपने बैक पैक्स उतार भी नहीं पाते, कि मैं फ़ौरन
पड़ोसियों के यहाँ भागता हूँ. आन्ना बिल्याएवा, विक्टर
पेत्रोविच और कुबड़ी आन्ना मिखाइलोव्ना के पास.
आन्ना बिल्याएवा मुझे
“ख़रगोश” कहकर बुलाती है और बातें करते हुए पुचकारती है. अजीब बात है, कि मुझे
वही सबसे ज़्यादा अच्छी लगती है. मगर आन्ना बिल्याएवा के सिर पे हमेशा रूमाल बंधा
होता है, वो हमेशा जैसे धूल से भरी होती है, और उसका पुचकारना बिल्कुल बुरा नहीं लगता.
विक्टर पेत्रोविच मेरी तरफ़
कम ध्यान देते हैं,
मगर उनका घर बहुत बड़ा और ख़ूबसूरत है और दरवाज़े के सामने चकमक पत्थर
का चबूतरा है. इन चकमक पत्थरों से घिसकर मैं चिंगारियाँ निकालता हूँ. और अगर देर
तक घिसा जाए, तो चकमक पत्थर जली हुई मुर्गी जैसी गंध छोड़ते
हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि मैं तोन्या नानी से ज़िद
करता हूँ, जिससे वो भी चकमक पत्थर सूँघे. एक बार तोन्या नानी
मेरे आस-पास नहीं थी, इसलिए मैंने कुबड़ी आन्ना मिखाइलोव्ना
को चकमक पत्थर सूँघने का सुझाव दिया. तब से वह इस बात पर ज़ोर डाल रही है, कि हम अपनी रास्बेरी को कहीं और लगा लें, जो उसके
आँगन में पसर रही है.
और कुछ ही दिन पहले हमारा
गेट खुलता है और बुदुलाय (प्रसिद्ध फ़िल्म ‘जिप्सी’ का
हीरो) भीतर आता है. फ़िल्म “जिप्सी” तो मुझे कुछ इण्डियन फ़िल्म्स से भी ज़्यादा पसंद
है, और यहाँ – सचमुच का, असली बुदुलाय,
दाढ़ी वाला, कुछ सफ़ेद बाल, हट्टा कट्टा, और न जाने कैसे, वो
तोन्या नानी को जानता है!
“अन्तोनीना इवानोव्ना!” वो
चिल्लाता है.
नानी बाहर आती है, और पता
चलता है, कि ये ईल्या अंद्रेयेविच है, जिसके
साथ वह कभी काम किया करती थी. मगर मेरे लिए तो वो – सिर्फ अंकल बुदुलाय है.
उसे अच्छा लगता है कि मैं
उसे इस नाम से बुलाता हूँ. पता चलता है कि उसकी समर कॉटेज बिल्कुल हमारी कॉटेज के
पास ही है, और अब मैं सारे दिन वहीं बिताता हूँ. बुदुलाय के यहाँ बड़े बड़े सेब हैं,
गुलाबी रंग के, और अब ये मेरा पसंदीदा ब्राण्ड
बन गया है, और उसके घर की दीवारों पर हमारे ड्रामा थियेटर के
पुराने ‘शो’ “हाजी नसरुद्दीन की वापसी”
के इश्तेहार चिपके हैं, और बुदुलाय मुझे कुछ इश्तेहार देता
है, जिससे मैं भी अपने घर में दीवारों पर चिपकाऊँ. उसका एक
बेटा भी है – अंद्रेइ, जिसके साथ मिलकर मैं ग्रीन हाउस बनाता
हूँ, मतलब, वो और बुदुलाय बना रहे हैं,
और मैं बगल में घूम रहा हूँ और अंद्रेइ को ड्रम में बॉल फेंकने के
लिए बुलाता हूँ. एकदम तो नहीं, मगर मैं बॉल डाल ही देता हूँ,
और हम बड़ी, दानेदार, हरी
बॉल पानी से भरे बड़े भारी, लोहे के ड्रम में फेंकने लगते
हैं. फिर खाना खाते हैं. मुझे भूख नहीं है, मगर जब मैंने
देखा कि बुदुलाय ने कैसे चाकू से डिब्बा-बंद चीज़ें खोलीं और, चाकू से उन्हें हिलाकर उसमें ब्रेड डुबाने लगा, तो
मैं समझ गया कि मैंने बेकार ही अपने हिस्से के खाने से इनकार किया था, और मैं कहता हूँ, “दीजिए”. बुदुलाय बाऊल लेता है,
जिससे डिब्बे से कुछ खाना निकालकर मुझे दे, मगर
मेरे लिए तो बाऊल के बजाय सीधे डिब्बे से ही खाना महत्वपूर्ण है, और मैं पूछता हूँ, “क्या मैं भी इसी तरह सीधे डिब्बे
से खा सकता हूँ”. बुदुलाय मुस्कुराता है, ख़ास मेरे लिए एक
डिब्बा खोलता है और मुझे चाकू देता है, ज़ाहिर है, वह समझ रहा था कि फ़ोर्क से खाना मुझे उतना स्वादिष्ट नहीं लगेगा.
और कहते हैं, कि जो
चाकू से कहता है – वो दुष्ट होता है. बकवास. बुदुलाय, शायद
अक्सर चाकू से ही खाता है, और उससे ज़्यादा भले किसी और आदमी
को मैं नहीं जानता.
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