बुधवार, 1 नवंबर 2017

Indian Films Hindi - 02

प्यार के बारे में


 जब मैं बिल्कुल छोटा था, तो मुझे वेरोनिका अच्छी लगती थी. वो बगल वाले प्रवेश द्वार में रहती थी, और सफ़ाई कर्मचारी दाशा आण्टी मुझे इस प्रवेश द्वार में घुसने नहीं देती थी, क्योंकि मैंने सूरजमुखी के बीज फर्श पर बिखेर दिए थे. फिर मम्मा ने दाशा आण्टी को वाशिंग पावडर का डिब्बा दिया, और दाशा आण्टी मुझे अंदर छोड़ने लगी.
वेरोनिका के बाल काले थे और आँखें हरी. हम गैस स्टेशन पे घूमते और टी.वी. देखते. वैसे, हम एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे, और सब लोग हमसे जलते थे, ख़ासकर हमारे कम्पाऊण्ड का एक लड़का ल्योशा रास्पोपोव. फिर मैं स्कूल जाने लगा, घूमने-फिरने के लिए अब कम टाइम मिलता था, और इसके बाद वेरोनिका दूसरे शहर चली गई. मगर, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो मैं उसे ज़रूर ढूँढ़ लूँगा और हम शादी कर लेंगे.
और मैंने अपना निबंध टीचर को दे दिया.
और हमारी क्लास में पढ़ती थी लीज़ा स्पिरिदोनोवा. वो भी ख़ूबसूरत थी, मगर मुझे वो ज़रा भी अच्छी नहीं लगती थी, क्योंकि उसे देखकर ही पता चल जाता था, कि वो दुष्ट है. तो, ब्रेक में लीज़ा स्पिरिदोनोवा टीचर की मेज़ के पास गई, मेरा निबंध पढ़ा और मुझे हुक्म देने लगी कि कहाँ अर्ध विराम होने चाहिए, और कहाँ नहीं. ऐसा, शायद, इसलिए, क्योंकि वो चाहती थी, कि दुनिया के सब लोग उसे प्यार करें, मगर मेरे तो जैसे माथे पर लिखा था, कि मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता. मेरे इस अज्ञान के लिए मुझे 3 नम्बर दिए गए, मगर लीज़ा स्पिरिदोनोवा को इससे भी चैन नहीं मिला. ऐसा तो नहीं है कि मैं सिर्फ अर्ध-विरामों के ही कारण उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता!
अब मैं ग्यारह साल का हूँ. मैंने इन नोट्स को, जो आपने पढ़े, अपने एक दोस्त को दिखाया, और उसने कहा, कि ये दिलचस्प तो हैं, मगर बहुत संक्षेप में हैं. मतलब, कि मैंने बहुत कम-कम लिखा है. मगर, मैं तो सिर्फ वही लिख सकता था, ना, जो वाकई में हुआ था, इसलिए, मैं सोच में पड़ गया: अभी तक तो कोई ज़्यादा दिलचस्प घटनाएँ हुई नहीं हैं, मतलब, मुझे अभी मालूम नहीं है कि किस बारे में लिखना है. मगर दोस्त ने मुझसे कहा:
“ मगर, तू उस बारे में लिख, जो भविष्य में होगा.”
 “ऐसा कैसे?” पहले तो मैं समझ ही नहीं पाया.
 “जैसे, तू ऐसा लिखता है,” – दोस्त ने मुझे समझाया (उसका नाम आर्तेम था), -“जब मैं इत्ते-इत्ते साल का था, तो ऐसा-ऐसा हुआ था. मगर अब ऐसा लिख : जब मैं इत्ते-इत्ते साल का हो जाऊँगा...और कल्पना कर कि क्या हो सकता है.”
मैंने फ़ौरन ये आइडिया पकड़ लिया और लिखने के लिए बैठ गया.
इस तरह इस छोटे से लघु-उपन्यास का दूसरा भाग प्रकट हुआ, जिसका शीर्षक है:


जब मैं हो जाऊँगा...

जब मैं बीस साल का हो जाऊँगा, तो वेरोनिका से मिलूँगा और हम शादी कर लेंगे. फिर धीरे-धीरे मैं एक इम्पॉर्टेन्ट आदमी बन जाऊँगा और तीस साल की उम्र में ज़रूर डाइरेक्टर बन जाऊँगा. ये बहुत पहले से चल रहा है, इसलिए बचोगे कैसे? मुझे सही-सही तो नहीं पता. कि वो कैसा काम होगा, जिसका डाइरेक्टर मैं बनूँगा, मगर काम बेहद ज़िम्मेदारी का होगा, कोई ऐसा-वैसा, फ़ालतू काम नहीं होगा. मैं अपनी कैबिन में बैठा करूँगा, टेलिफ़ोन पे बातें किया करूँगा, खिड़की के बाहर बहुत बड़ा कम्पाऊण्ड होगा, जिसमें बहुत सारे ट्रक्स, कन्टेनर्स, और ड्राइवर्स होंगे, और मुझे, चाहे कुछ भी हो जाए, पालिच को तीन बजे से पहले ल्वोव भेजना होगा, और वलेरा को – एलाबूगा भेजना है, इसी पल. मगर वलेरा को, पता है, एलाबूगा ले जाने के लिए कुछ भी नहीं है, वो बेकार खड़ा है! और, मैं टेलिफोन पर अपनी डाँट पिलाऊँगा:
 “आप समझ रहे हैं, जॉर्ज ल्वोविच, मुझे इस बात में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं है, कि आपके पास काम पे कौन आया है और कौन नहीं! मुझे बस इतना चाहिए, कि विश्न्याकोव को एग्रीमेंट के हिसाब से मिलना चाहिए!”
फिर मैं, पापा की तरह, डांटने लगूँगा, और पालिच फ़ौरन नोरील्स्क जाएगा, वालेरा – एलाबूगा, और मैं अपनी सेक्रेटरी वीका से शिकायत करूँगा कि सब के सब बेवकूफ़ हैं, एक सिर्फ मैं ही नॉर्मल हूँ हाँ, हाँ.
वीका हर बार मेरी हाँ में हाँ मिलाती रहेगी, अगर वो किसी बात में मुझसे सहमत नहीं हो, तो भी, मगर एक बार पता चल जाएगा, कि मैं बेहद गुस्सैल हूँ, और मैं उससे कहूँगा, कि अगर वो सहमत ना हो, तो साफ़-साफ़ कह दे, न कि कुछ अनाप-शनाप सोचने लगे.
“मैं कभी सोचती भी नहीं हूँ,” वीका आहत हो जाएगी, “सेर्गेइ व्लादिमीरोविच, मैं सचमुच में ऐसा सोचती हूँ कि आपके चारों ओर सब लोग बेवकूफ़ हैं, सिर्फ आप अकेले ही सामान्य हैं. और सबके साथ प्यार से पेश आते हैं, काफ़ी ज़्यादा प्यार से!”
अब बताइए, ऐसी सेक्रेटरी कहाँ मिलेगी? और, अगर उसे मेरी हाँ में हाँ मिलाना अच्छा लगता है, तो क्या किया जा सकता है?

जब मैं चालीस साल का हो जाऊँगा, तो मेरी डाइरेक्टरशिप की दसवीं एनिवर्सरी मनाई जाएगी.
सम्माननीय सहयोगियों, दोस्तों और कई सारी महिलाओं के बीच मैं क्षेत्रीय रेस्तराँ इंद्रधनुष्य’  में भोज वाली मेज़ पर बैठूंगा, स्नैक्स खाते हुए लोगों की शुभकामनाएँ और भाषण सुनूँगा, और मेरी दोस्ती और मेरे प्रति सम्मान का इज़हार किया जाएगा.
वैसे सिर्योझा,” मेरे डेप्युटीज़ में से एक कहेगा. “साधारण लड़का है, मगर जहाँ तक योग्यताओं का सवाल है, वो सबसे बिरला इन्सान है! वो टेलिफ़ोन का रिसीवर उठाता है और सिर्फ पाँच सेकण्ड्स में किसी को भी मना लेता है, जिससे समय पर सामान चढ़ाया और उतारा जा सके.”
बोलने वाले के अंदाज़ से ज़ाहिर हो रहा होगा कि उसके लिए मेरा अधिकार, मेरा प्रभुत्व सुदृढ़ और सर्वोच्च है, और मुझे ख़ुश करना – उसकी हार्दिक इच्छा है. मगर एक विरोधाभासी और कभी-कभी सनकी व्यक्ति होने के कारण, मैं अचानक अपने साथी को बिठा दूँगा और कहूँगा:
 “ठीक है, एफ़्रेमोव, कुछ न कहो. बेहतर है कि तुम स्नैक्स उठाओ, और फिर हम साथ मिलकर कराओके गाएँगे. इस समय मेरी बगल में बैठी हुई वेरोनिका मुस्कुराएगी और मुझसे कहेगी:
“कितने जंगली हो तुम!” और डान्स करने चली जाएगी.
और जब मैं समारोह से घर लौट रहा होऊँगा, तो मेरे साथ-साथ प्रसन्न वेरोनिका चल रही होगी.
 “क्या पार्टी थी!” वह कहेगी.
और मुझे न जाने क्यों ल्योशा रास्पोपोव की याद आ जाएगी.
वाकई में वो पूरे कम्पाऊण्ड का सबसे अच्छा लड़का था!


जब मैं साठ साल का हो जाऊँगा, तो मेरे पोते और पोतियाँ होंगे. वो अपने दादा से बेहद प्यार करेंगे, अच्छे नम्बर लाकर उसे ख़ुश करते रहेंगे और हमेशा मनाते रहेंगे कि मैं उनके साथ खेलूँ.
“मैं थक गया हूँ,” मैं टी.वी. का चैनल बदल कर कराहते हुए कहूँगा, “मुझे आराम करने दो, शैतानों!”
और तब मेरी पोती मरीना मुझे गले लगा लेगी और खूब खूब मनाते हुए कहेगी, कि मैं उनके साथ बाहर जाकर स्नो-मैन बनाऊँ.
 “बस, अब स्नो-मैनबनाना ही बाकी रह गया है!” मैं बेवकूफ़ों जैसे कहूँगा. मुझे मालूम है कि मेरे बस थोड़ा आवाज़ बिगाड़ने की देर है, मरीना हँसते-हँसते लोट पोट हो जाएगी. “ये-ए,” मैं बिगाड़ी हुई आवाज़ में कहूँगा, “आया है बूढ़ा ठूँठ बाहर सड़क पे और बना रहा है स्नो-मै-ए-न. इत्ती रात हो गई है, सारे बच्चे और उनके मम्मा-पापा अपने अपने बिस्तर पे जा चुके हैं, मगर, डैम इट, मरीना का नानू बना रहा है स्नो-मै-ए-न.”
मरीना को तो जैसे दौरा पड़ जाएगा, और मैं कहता रहूँगा:
“सुबह तक स्नो-मैन अचानक तालियाँ बजाएगा और नानू के चारों ओर दौड़ने लगेगा. त्रा-ता-ता! त्रा-ता-ता! बच्चे मेरी और स्नो-मैन की बगल से स्कूल जा रहे होंगे और कहेंगे:
चौदह नम्बर के क्वार्टर वाला (ये हमारा क्वार्टर है) बूढ़ा बिल्कुल सठिया गया है. पूरी रात सोता नहीं है!” मगर फिर हमारे प्रदेश में ज़ोरदार हवाएँ चलेंगी, बड़े बड़े तूफ़ान आएँगे, मगर मैं चाहे कहीं भी क्यों न छुप जाऊँ, मैं स्नो-मैन की हिफ़ाज़त करता रहूँगा.”   
“बस हो गया, नानू!” मरीना चिल्लाने और चिंघाड़ने लगेगी, मगर मैं कहता रहूँगा:
“और हवा मेरे साथ-साथ स्नो-मैन को भी धरती से हमेशा के लिए उड़ा ले जाएगी. ऐसा न हो, इसलिए, मेरी प्यारी पोती, मुझे अपने साथ स्नो-मैन बनाने के लिए मत कहो.”
इस तरह मैं बर्फ से कुछ भी बनाने के लिए नहीं जाऊँगा, और बच्चों के साथ खेलता रहूँगा.
जब मैं करीब अस्सी से कुछ ऊपर हो जाऊँगा, तो मेरी अंतिम घड़ी निकट आ जाएगी. मगर इस कठिन पल में भी मैं ख़ुश मिजाज़ बना रहूँगा. पोते-पोतियों को अपने पास बुलाऊँगा और कहूँगा:
“बच्चों, मेरी अंतिम घड़ी आ पहुँची है. तुम्हारा नानू हर पल मौत के करीब जा रहा है. जल्दी से चाय और सैण्डविचेज़ लाओ, आख़िरी बार खा लें.
आँखों में आँसू भरे पोती मरीना सैण्डविचेज़ बनाने के लिए जाएगी, और गंभीर पोते (वो, ख़ैर, तब तक बड़े आदमी बन चुके होंगे) पत्थर जैसे चेहरों से सोफ़े पर बैठेंगे, और ज़िंदगी उन्हें बोझ प्रतीत होगी.
और, जब मैं उनकी तरफ़ देखूँगा, तो मुझे जैसे छोटा सा शैतान काट लेगा.   
“दुखी हो गए, बच्चों?” मैं पूछूँगा. “बेहतर है कि मेरी नसीहत सुनो. डेनिस, तुझे मैं नसीहत देता हूँ और सिर्फ दोस्ताना अंदाज़ में सलाह देता हूँ, कि तू तेरी फ़र्म में डाकुओं के बीच काम करना छोड़ दे, और ईमानदारी से रहना और काम करना शुरू कर. और तुझे, एल्बर्ट, मैं कोई सलाह नहीं दूँगा, क्योंकि तू ख़ुद ही समझदार है. एक ही बात, जो मैं कहना चाहता हूँ, वो ये है, कि कभी भी ऐसा चेहरा मत बनाना, जैसा तूने अभी बनाया है. मैं समझ सकता हूँ, कि मेरी मौत दुखदायी है, मगर अपनी ज़िंदगी का क्या करेगा?” – और मैं नाक सुड़क लेता हूँ.
इसी समय मरीना हमारे लिए चाय और सैण्डविचेज़ लाएगी, मगर अब मेरा मन नहीं है और मैं अपने पोतों से चाय पीने के लिए कहता हूँ.
“चलो, एलबर्ट और डेनिस, मेरी सुखद यात्रा के लिए!”
 “नानू, चाय पीने का मन नहीं है...” दाँत किटकिटाते हुए, डेनिस और एल्बर्ट कहेंगे और जो हो रहा है, उसे बर्दाश्त न कर सकने के कारण मुट्ठियाँ भींच लेंगे.
 “खाओ, कहता हूँ खाओ!!!” मैं बेतहाशा चिल्लाऊँगा, जैसे जवानी में चिल्लाया करता था.
और, जैसे ही वे बढ़िया सैण्डविचेज़ को मुँह लगाएँगे, जैसे मरीना हमेशा बनाती थी, मेरी रूह छत की ओर उड़ेगी, फिर खिड़की से बाहर निकल जाएगी, घर के ऊपर तैरेगी और जल्दी ही ख़ुदा के घर पहुँच जाएगी.
“तो,” ख़ुदा कहेगा, “बेकार में इधर उधर न डोल. ये कपड़ा उठा और धूल झाड़, जैसे बाकी सब कर रहे हैं. वर्ना तो यहाँ जन्नत जन्नत नहीं बल्कि जहन्नुम बन जाएगी.”
और मैं धूल साफ़ करने लगूँगा, जिससे जन्नत जन्नत ही रहे, और...वगैरह, वगैरह.  


एक समय ऐसा भी आएगा, जब मैं बिल्कुल ही नहीं रहूँगा.                       
गाँवों के रास्तों पे शिशिर की बारिश की झड़ी लगेगी, कम्पाऊण्ड्स में चीरती हुई हवाएँ चलेंगी, और मेरा पैर क्यारियों पे कभी नहीं पड़ेगा, मेरे हाथों की ऊँगलियाँ कभी नहीं चटखेंगी, मेरा मुँह कभी चेरी-जूस नहीं पिएगा और मेरा दिल कभी ख़ुशी से नहीं भर उठेगा. नए लोग जनम लेते रहेंगे . वो अपनी-अपनी ज़िन्दगी जिएँगे, मेरे अनुभव से कुछ भी न लेते हुए.
मगर, हो सकता है, वो कभी मेरी छोटी सी किताब पढ़ लें. वो पढ़ेंगे, कि कैसे मैं और वेरोनिका गैस-स्टेशन पे घूमा करते थे, और जहाँ वो लोग रहते हैं, वहाँ भी गैस-स्टेशन्स होंगे. हमारे यहाँ तो गैस-स्टेशन्स हमेशा घरों के आस-पास ही होते हैं!
लीज़ा स्पिरिदोनोवा जैसी दुष्ट सुंदरियाँ भी, फूल फेंकेंगी और मुस्कुराएँगी, इस बारे में बिल्कुल भूल जाएँगी कि उनसे भी ख़ूबसूरत कोई और है.
 “हो-हो!” तब ऊँचे आसमान से मैं उनसे कहूँगा.
और तब, हल्की बारिश शुरू हो जाएगी. वो अपने अपने घरों में भागेंगी चाय पीने के लिए और टी.वी. देखने के लिए, जहाँ कई शामों को लगातार दॉन किहोते के बारे में फ़िल्म दिखा रहे होंगे.



मेरा नाम जोकर...
           


 इण्डियन फ़िल्म्स की तरह नास्त्या भी पहली ही नज़र में पसंद आ गई. पहले तो हमारे बीच सब कुछ बड़ी अच्छी तरह चल रहा था, मगर फिर (वो भी, शायद पहली ही नज़र में) नास्त्या को पुरानी इण्डियन हिंदी फ़िल्म मेरा नाम जोकर पसंद नहीं आई. और हम अलग हो गए.
ये सब ऐसे हुआ.
नास्त्या मेरे घर आई, हमने कॉफ़ी पी, और मैंने कोई फ़िल्म देखने का सुझाव दिया. जैसे, ‘मेरा नाम जोकर’.
“चल, देखते हैं,” नास्त्या ने कहा.
मैंने कैसेट लगाई, और स्क्रीन पर दिखाई दिया: राज कपूर फ़िल्म्स प्रेज़ेन्ट्स. मेरी आँखों में आँसू आ गए और सर्कस के अरेना में रंगबिरंगी रिबन्स के, गुब्बारों के शोर के बीच जोकर की ड्रेस में राज कपूर निकला. उसके पास फ़ौरन सफ़ेद एप्रन पहने, हाथों में कैंचियाँ लिए कई सारे लोग भागते हुए आए.
“आपके दिल का फ़ौरन ऑपरेशन करना पड़ेगा, ”  उन्होंने कहा.
 “क्यों?” राज कपूर ने पूछा.
 “क्योंकि, इतने बड़े दिल के साथ, जैसा आपका है, ज़िंदा रहना बेहद ख़तरनाक है,” उन्होंने कहा, “क्योंकि इतना बड़ा दिल तो दुनिया में किसी के भी पास नहीं है! सोचिए, क्या होगा, अगर आपके दिल में पूरी दुनिया समा जाए?!”
और राजकपूर गाना गाने लगा. मैं ये भी भूल गया कि मेरी बगल में नास्त्या बैठी है. उत्तेजना के कारण मेरे दाँत कस कर भिंच गए थे, और मैंने दाएँ हाथ से बाएँ हाथ की कलाई इतनी कस के पकड़ रखी थी, कि उसमें दर्द हो रहा था.      
पहला आधा घण्टा तो नास्त्या बिना किसी भावना के देखती रही. फिर वो हँसने लगी. राजकपूर की मम्मा मर रही है, वो उसी शाम अरेना में निकलता है और बच्चों को हँसाता है, और शोके बाद काला चश्मा पहन लेता है, जिससे कि कोई उसके आँसू न देख सके... और नास्त्या हँस रही है!
 “ओय, चश्मा कैसा है उसका – एकदम सुपर! – वो कहती है.
 “नास्त्या,” भिंचे हुए दाँतों के बीच से मैं तिलमिलाता हूँ, “ये फिल्म सन् सत्तर की है!”                    
मगर नास्त्या को इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता था कि फ़िल्म कौन से सन् की है. जब राज कपूर ने अपने सामने पुराने चीथड़ों से बना गुड्डा-जोकर रखा और स्कूल टीचर के साथ अपने पहले नाकामयाब प्यार के बारे में बताने लगा, तो मुझे नास्त्या की तरफ़ देखने में भी डर लगने लगा. मैं सिर्फ हँसी दबाने की उसकी ज़बर्दस्त कोशिशें ही सुन रहा था.
करीब बीस मिनट तक हम तनावपूर्ण ख़ामोशी के बीच फ़िल्म देखते रहे. नास्त्या ने अपने गालों को हाथ से पकड़ रखा था, और वो कोशिश कर रही थी कि परदे की तरफ़ न देखे. मुझे अपने भीतर ऐसी ताकत महसूस हो रही थी, कि जैसे मैं अपनी नज़र से हमेशा के लिए सूरज को बुझा दूँगा. राज कपूर समन्दर के किनारे पर किसी कुत्ते को सहला रहा था.
“सिर्योग, क्या ये फ़िल्म बहुत देर चलेगी?” आख़िर नास्त्या ने पूछ ही लिया.
जैसे मुझे चिढ़ाने के लिए रिमोट भी कहीं गिर गया था. फिर मैंने उसे ढूँढ़ा, कैसेट रोक दिया, उसे वीड़ियो-प्लेयर से बाहर निकाला, उसे डिब्बे में रख दिया और डिब्बे से नज़र हटाए बिना धीरे-धीरे कहा:
 “सोवियत बॉक्स ऑफिस में ये फ़िल्म दो घण्टे से कुछ ज़्यादा की थी. मगर, मेरे पास – पूरी, ओरिजिनल फ़िल्म है. तीन घण्टे चालीस मिनट की.”
“बड़ी तकलीफ़देह बात है,” नास्त्या ने कहा.
“तकलीफ़देह,” मैंने दुहराया और मेज़ पर कोई ताल देने लगा.
“सिर्योग,” नास्त्या ने भँवें चढ़ाईं, “क्या तुझे भी ये सब मज़ाकिया नहीं लगता? देख, कैसा है वो, बूढ़े ठूँठ के जैसा, मगर जा रहा है, जा रहा है, अपने लिए दुल्हन ढूँढ़ रहा है! और जब सब उसे निकाल देते हैं, तो वो बैठा-बैठा अपने गुड्डे से शिकायत करता है!”
“नहीं,मैंने कहा, “मुझे इसमें कोई मज़ाक नज़र नहीं आता.”
बकवास,” नास्त्या ने कहा. “ चल, इससे अच्छा, मैं कोई म्यूज़िक लगाती हूँ.”
मैंने मेज़ से लाइटर उठाया, उसे क्लिक किया और लौ की ओर देखता रहा.
 “म्यूज़िक तो तू कभी भी लगा सकती है. मगर फ़िल्म मेरा नाम जोकरतो तुझे दुनिया का कोई भी नौजवान नहीं दिखाएगा.”
“थैन्क्स गॉड,” नास्त्या हँस पड़ी.
इसके बाद हम कभी भी एक दूसरे से नहीं मिले.
जाते जाते नास्त्या ने यकीन से कहा, कि पहले मैं ही उसे फ़ोन करूँगा. मगर मैंने फ़ोन नहीं किया. कुछ ही दिन पहले मैं आन्या से मिला. मैं उसे मेरा नाम जोकरनहीं दिखाऊँगाउसे मैं श्री 420दिखाऊँगा. उसमें राजकपूर काफ़ी जवान है, और गाने भी बढ़िया हैं.



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