सिर्गेइ पिरिल्याएव
इण्डियन फ़िल्म्स
हिंदी अनुवाद
आ. चारुमति रामदास
दुनिया की सबसे
अच्छी मेरी माँ को,
प्रस्तावना
जब बाल साहित्य
में किसी सुयोग्य लेखक का आगमन होता है, तो सारी धरती इस अनूठी घटना का स्वागत करती है.
क्योंकि हमारे ग्रह पर हर असली बाल लेखक – सोने जितना मूल्यवान होता है. वैसे, जापान
में ऐसे विशेष व्यक्तियों को, जो जीवन में खुशियाँ लाते हैं, “मानवता की दौलत” कहते हैं.
ऐसी
ही दौलत है – लेखक सिर्गेइ पिरिल्याएव, जिसने बचपन के बारे में एक अद्भुत लघु उपन्यास दुनिया
को दिया है. उसे हर उम्र के बच्चे पसंद करेंगे. और बुढ़ापे तक बार-बार पढेंगे.
क्योंकि इसमें कोई चीज़ है, जिस पर हँस सकते हैं! बैठो,
किताब खोलो और ठहाके लगाओ. क्या
ज़िंदगी में इससे बड़ा आनंद कहीं है? असल में हास्य की भावना की शिक्षा – आत्मा की
स्वतंत्रता की शिक्षा ही तो है.
“इण्डियन
फिल्म्स” के नायक की आत्मा स्वतंत्र है – जोशीली,
बेचैन,
ईमानदार,
हरेक की मदद को तैयार, ये
आत्मा है एक कवि की और कलाकार की, जो स्वयम् लेखक सिर्गेइ पिरिल्याएव के इतने नज़दीक है.
मुझे यकीन है कि इस नायक की आत्मा हर पाठक को अपने दिल के निकट महसूस होगी. वह
दुनिया की ओर देखने की उस ताज़ा और अचरजभरी दृष्टि को पैदा करेगी (या याद दिलाएगी?)
जो हम सबके लिए बेहद ज़रूरी है, ख़ास तौर से उनके लिए,
जो बच्चों के लिए लिखते हैं.
अपनी
रचनाओं में सिर्गेइ पिरिल्याएव बाल साहित्य की सर्वोत्कृष्ट परंपराओं को आगे बढ़ा
रहे हैं, जिसका उद्गम – यूरी सोत्निक, निकोलाय
नोसोव, विक्टर द्रागून्स्की,
ल्येव कास्सिल की कहानियों से हुआ है.
वर्तमान
समय में ये विधा बिरले ही देखी जाती है. क्यों कि वह बहुत कठिन है. और, ये
बता दूँ, कि साहित्य में ऐसी ख़ुशनुमा, ठोस
विषयवस्तु वाली, ज्वलंत, और साथ ही “ज़िंदगी से भरपूर” कहानियाँ – उच्च कोटी की
कलाबाज़ियों जैसी हैं.
और
मुझे ख़ुशी है, कि हम धरती से इस बहादुर पायलट की अचूक कलाबाज़ी को देख
सकते हैं, जिसे दुनिया में सबसे ज़्यादा अपनी नानी तोन्या से, नानू
मोत्या से, परनानी नताशा से,
भाई व्लादिक से प्यार है, और
ख़ास तौर से – ख़ूब दूर स्थित, पहुँच के बाहर,
रहस्यमय और न सुलझने वाली पहेली जैसी
इण्डियन फिल्म्स से प्यार है.
मरीना मस्क्वीना
तीन
से अनंत तक
जब हम घूमते थे
....
गैस स्टेशन पर ....
जब मैं....
जब मैं तीन साल
का था, तो
मम्मी-पापा ने मेरे लिए एक साइकिल - ‘तितली’ – खरीदी. मुझे उस पर जाने में बहुत डर लगता था, क्योंकि
मुझे साइकिल चलाना आता नहीं था, और तब पापा ने पिछले पहिए के दोनों ओर दो और छोटे-छोटे
पहिए फ़िट कर दिए. वो इसलिए कि मैं आसानी से साइकिल चलाना सीख जाऊँ. मगर इन दो
पहियों की वजह से साइकिल ऐसी राक्षस जैसी हो गई,
कि चलाते रहो-चलाते रहो, मगर
कहीं जा ही ना पाओ. और फिर, इन फ़िट किए हुए पहियों के कारण मुझे साइकिल चलाने में
शरम भी आती थी, क्योंकि सभी समझ जाते कि उनके बिना मेरा काम नहीं चल
सकता. ये मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता था,
और मैंने फ़ौरन मम्मी-पापा से कह दिया
कि मैं तो बगैर इन एक्स्ट्रा पहियों के ही चलाऊँगा.
और, वाकई
में, साइकिल चलाने में ज़रा भी मुश्किल नहीं हुई. मैं , जैसे
साइकिल पे नहीं जा रहा था, बल्कि ‘तितली’ पे सवार होकर अपने कम्पाऊण्ड में उड़ रहा था. मगर, फिर
ऐसा हुआ कि मैं टीले से नीचे उतर रहा था और मेरे रास्ते में अचानक स्टॉलर के साथ
एक औरत प्रकट हुई. मैंने उसे कितना ही चिल्लाकर कहा कि एक ओर को हट जाए, मगर
उसे, ज़ाहिर है, ऐसा लगा, कि पहाड़ी की ऊँचाई को देखते हुए ‘तितली’ पर
सवार मुझसे उसे कोई ख़तरा नहीं है. तो, मुझे अचानक टर्न लेना पड़ा. मैंने तेज़ी से दाहिनी ओर
टर्न लिया, हैण्डल पार करते हुए साइकिल से गिर गया और मेरी दाईं छोटी
उँगली में मोच आ गई.
इमर्जेन्सी
रूम में एक ख़ूबसूरत नर्स ने मेरी उँगली ठीक कर दी. मुझे दर्द महसूस न हो, इसलिए
वह पूरे समय मुस्कुराकर दुहराती रही, जैसा फ़िल्म में होता है:
“आँखें
बंद कर और बर्दाश्त कर, तू तो मेरा शांत बच्चा है.”
अब
ज़रा अच्छा भी लग रहा था.
जब
मैं चार साल का था, तो मैं घर में एक बिल्ली लाया, जिससे
कि उसे घर में पाल सकूँ. मगर मुझे उसको रखने की इजाज़त नहीं दी गई, बल्कि, सिर्फ
बिल्ली को दूध पिला दिया और उसे भगाने लगे. कम से कम दूध नहीं पिलाते, सिर्फ
भगा देते, मगर यहाँ तो दूध भी पिलाया – और, गेट
आऊट! मुझे इतना अपमान लगा, कि मैंने बिल्ली के साथ घर छोड़ने का फ़ैसला कर लिया, और,
बस, फ़ुलस्टॉप.
मैं
निकल गया.
नौ
नंबर की बस में बैठा और चल पड़ा, बिल्ली को पूरे समय हाथों में पकड़े रहा. सब लोग मेरे
पास आने लगे: कितनी अच्छी बिल्ली है, कितनी अच्छी बिल्ली है! बिल्ली मुझे लगातार नोंचे जा
रही थी, बस ने अपना चक्कर पूरा किया और वापस उसी जगह पर आ गई.
मैं बेहद तैश में आ गया और मैंने फ़ैसला कर लिया,
कि अबकी बार घर से पैदल ही जाऊँगा.
मैंने गैस स्टेशन (पेट्रोल पम्प) का चक्कर लगाया और घास के मैदानों से होता हुआ
चलता रहा. बिल्ली को ले जाना मुश्किल होता जा रहा था,
क्योंकि वो न सिर्फ मुझे खरोंचे मार
रही थी, बल्कि बैल जैसी आवाज़ में म्याऊँ-म्याऊँ भी कर रही थी. इसके अंदर ऐसी हिम्मत कहाँ से आई? मैं
सुस्ताने के लिए बैठा, जिससे कि थोड़ी देर के लिए बिल्ली को न पकड़ना पड़े, - मैंने सोचा,
कि ये ख़ुद ही थोड़ा घूम-फिर लेगी. मगर
जैसे ही मैंने उसे छोड़ा, वो तीर की तरह भाग गई. ज़ाहिर है, उसे
मेरा बर्ताव अच्छा नहीं लगा था – उसकी ख़ातिर घर से निकल जाने का.
और, ये
किसी गाँव के रास्ते के पास ही हुआ था. मेरा मूड बेहद ख़राब हो गया. मैं किनारे पर
बैठ गया. पैरों में दर्द हो रहा है, पूरे बदन पे खरोंचें हैं,
बिल्ली भाग चुकी है – रोने को दिल
चाह रहा था. अचानक देखा – एक कार आ रही है. और कैबिन में हैं अंकल वोलोद्या – ये
मेरे पापा के गराज वाले दोस्त हैं. उन्होंने मेरी ओर हाथ हिलाया:
“ऐ! तू यहाँ कैसे आया? चल
घर तक ले चलता हूँ!”
और, ले
आए. मगर, फिर भी, मैं घर से चला ही जाऊँगा. अगर वो एक बिल्ली को भी नहीं
रख सकते, तो फिर आगे भी कोई उम्मीद कैसे होगी?
जब
मैं पाँच साल का था, तो मुझे दस रूबल का नोट मिला. ये बहुत सारे पैसे थे, मतलब
आज के दस हज़ार के बराबर, बस, उस समय नोट दूसरे हुआ करते थे. तो, मतलब, जैसे
ही मुझे दस रूबल्स मिले, बड़े लड़के फ़ौरन मेरे पास भागे-भागे आए. एक बोला:
“सुन, मेरे
दस रूबल्स खो गए हैं!”
दूसरे
ने उसे धक्का दिया, और वो भी बोला:
“नहीं, मेरे!
सुबह, जब मैं कुत्ते के साथ घूम रहा था!”
मैं
उस लड़के को दस रूबल्स देने ही वाला था जो कुत्ते के साथ घूम रहा था, मगर
तभी तीसरे प्रवेश द्वार वाली मेरे पड़ोसन,
वेरोनिका हमारे पास आई, और
कहने लगी:
“
झूठ बोल रहा है, तेरे पास तो कुत्ता ही नहीं है! ये इसके दस रूबल्स हैं, क्योंकि
उसे ये सड़क पर पड़े हुए मिले!”
सब
लोग मुझसे जलने लगे, सिर्फ दस रूबल्स की वजह से नहीं, बल्कि
इसलिए भी, कि वेरोनिका ने मेरी तरफ़दारी की थी. क्योंकि वेरोनिका
बहुत ख़ूबसूरत थी और उसने मेरी तरफ़दारी की थी,
न कि उनकी. उसके बाद मैंने और
वेरोनिका ने पेट्रोल-पम्प का एक चक्कर
लगाया और उसके घर में टी.वी. भी देखा.
बाद
में अपने कम्पाऊण्ड में लड़के मुझे चिढ़ाने भी लगे,
कि मुझे प्यार हो गया है, मगर
मैं तो जानता था कि ऐसा जलन के मारे कर रहे हैं,
इसलिए मैंने बुरा नहीं माना. और फिर, अगर
मुझे प्यार हो भी गया हो, तो क्या? हो सकता है,
मेरी वेरोनिका के साथ शादी भी हो
जाती, अगर एक वाकया न होता.
मैं
अपने प्रवेश द्वार के पास खड़ा था, सूरजमुखी के बीज चबा रहा था.
तभी
सफ़ाई करने वाली दाशा आण्टी आ गई. मैंने बीज छुपा लिए,
मगर दाशा आण्टी पूछने लगी:
“बेटा, क्या
तुझे पता है कि ये बीज यहाँ कौन कुतर रहा था?”
मैंने
भी उससे कह दिया:
“दाशा
आण्टी, अगर ईमानदारी से कहूँ,
तो ये मैं था.”
अब
तो वो मुझ पर ऐसे चिल्लाने लगी, जैसे पागल हो गई हो! बोली,
कि मैं प्रवेश द्वार में कदम भी ना
रखूँ.
मतलब, वेरोनिका
वाले प्रवेश द्वार में.
दाशा
आण्टी पहली मंज़िल पे रहती है, और उसकी खिड़की प्रवेश द्वार के बिल्कुल बगल में ही है.
मतलब मामला बिगड़ गया है. ओह गॉड, काश कोई दाशा आण्टी को कोई और क्वार्टर दे देता? हो
सकता है, वो ज़्यादा दयालु बन जाती!
जब
मैं छह साल का था, तो पापा ने मुझे फ़ुटबॉल की गेंद प्रेज़ेन्ट की. मगर ये
कोई सीधी सादी गेंद नहीं थी, बल्कि वो ही गेंद थी जिससे सचमुच की ‘स्पार्ताक’ टीम
वाले प्रैक्टिस करते थे.
ऐसा
इसलिए हुआ, क्योंकि मेरे पापा के एक दोस्त मॉस्को में रहते हैं और
उनकी बेस्कोव से दोस्ती है. और बेस्कोव – ‘स्पार्ताक’ टीम का ट्रेनर है. बड़े बच्चे फ़ौरन मुझे अपने खेल में
शामिल करने लगे, वो ही, जो मुझसे दस रूबल्स छीन लेना चाहते थे. वो मुझे बुलाने
मेरे घर पे भी आ जाते, जैसे मैं भी बारह साल का हूँ, न
कि छह साल का. मैं बहुत ख़ुश था, क्योंकि हमारे कम्पाऊण्ड का सबसे बढ़िया लड़का, ल्योशा
रास्पोपोव भी मुझसे हाथ मिलाकर हैलो करने लगा और उसने मुझे लेमोनेड भी पिलाया.
मगर
फिर स्पार्ताक वाली गेंद उड़कर किसी नुकीली चीज़ से टकराई, फ़ट
गई, और ल्योशा ने मुझे लेमोनेड पिलाना और मुझसे हाथ मिलाना
बंद कर दिया. उसने मुझसे हैलो कहना भी बंद कर दिया. पहले तो मैं बड़ा उदास हो गया, मगर
फिर मेरी मम्मा ने दाशा आण्टी को वाशिंग पावडर का एक डिब्बा दिया, और
मैं फिर से वेरोनिका वाले प्रवेश द्वार में जाने लगा.
अब
ल्योशा रास्पोपोव बड़े लड़कों के साथ बेंच पर बैठता है,
और मैं और वेरोनिका लकड़ी के रोलर
कोस्टर के पास बैठकर बातें करते हैं. बड़े लड़कों को दुबारा मुझसे जलन होने लगती है, क्योंकि
वेरोनिका न सिर्फ ख़ूबसूरत है, बल्कि उसके चेहरे से साफ़ पता चलता है कि मैं उसे पसंद
हूँ. बस, ल्योशा रास्पोपोव यही बात शांति से नहीं देख सकता.
जलकुक्कड़ कहीं का, और ऊपर से पूरे कम्पाऊण्ड का सबसे अच्छा लड़का है!
जब
मैं सात साल का था, तो स्कूल जाने लगा. हमारी टीचर का नाम था रीमा
सिर्गेयेव्ना. तो, पहले ही दिन,
पहली ही क्लास में, वह
बोलीं:
“हमारी क्लास – ये एक जहाज़ है, जिसमें बैठकर हम ज्ञान के सागर में निकल पड़े हैं. क्या कोई कैप्टेन बनना चाहता है?”
“हमारी क्लास – ये एक जहाज़ है, जिसमें बैठकर हम ज्ञान के सागर में निकल पड़े हैं. क्या कोई कैप्टेन बनना चाहता है?”
और
ख़ुद मेज़ पर रखे कुछ कागज़ों को इस तरह उलट-पुलट करने लगी, जैसे
उसे पक्का मालूम हो, कि कोई भी ज्ञान के जहाज़ का कैप्टेन नहीं बनना चाहता.
मगर मैं तो हमेशा से कैप्टेन बनना चाहता था. हाँलाकि,
ज्ञान के जहाज़ का तो नहीं, मगर
बेहतर होता कि किसी दूसरे जहाज़ का कैप्टेन बन जाता,
मगर अगर सिर्फ यही जहाज़ सामने हो, तो
क्या कर सकते हो.
“मैं बनना चाहता हूँ कैप्टेन!” मैंने कहा.
रीमा
सिर्गेयेव्ना ने अचानक पूछा:
“मगर, क्या
तुम कठिनाइयों और संदेहों की लहरों का मुकाबला करते हुए जहाज़ को निर्दिष्ट दिशा
में ले जा सकते हो? क्योंकि ज्ञान का सागर – एक गंभीर, भयानक
चीज़ है!”
इससे
साफ़ पता चल रहा था, कि उसकी राय में,
मैं न सिर्फ ये, बल्कि
कुछ भी करने के काबिल नहीं हूँ. वह कह रही थी,
और अपने लिपस्टिक को ठीक-ठाक कर रही
थीं. वहाँ कुछ चिपक गया था.
“ठीक है,
रीमा सिर्गेयेव्ना,” मैंने अपनी बात जारी रखी,
“मैंने आपके उस सवाल का जवाब तो दिया
था कि लेनिनग्राद को लेनिनग्राद क्यों कहते हैं! क्योंकि ‘ग्राद’ – इसका मतलब पुराने ज़माने में होता था ‘शहर’! मैं जहाज़ भी मैनेज कर लूँगा, आप
परेशान न हों.”
“नहीं,
मैनेज नहीं कर पाओगे,” न जाने क्यों उसने बहुत ख़ुशी से कहा, और
बात ख़त्म हो गई. उसकी लिपस्टिक पूरी ख़राब हो गई,
और मैं समझ गया मैं कैप्टेन नहीं
बनूँगा. मगर बाद में पता चला कि कैप्टेन बनेगी ख़ुद रीमा सेर्गेयेव्ना. मगर किसी भी
किताब में और किसी भी फ़िल्म में कैप्टेन डेक पर लिपस्टिक ठीक नहीं करतीं. और, वो
भी सेलर्स के सामने!
जब
मैं आठ साल का था, तो मैंने टेलिविजन पे एक ख़त लिखा, जिसमें
ये विनती की थी, कि दॉन किहोते के बारे में फ़िल्म दिखाएँ. मैं नहीं
जानता था, कि दॉन किहोते कौन है,
मगर नार्सिस अंकल से (ये भी मेरे
पापा के एक दोस्त हैं) बातचीत के दौरान पता चला, कि दॉन किहोते मुझसे बहुत मिलता जुलता है.
नार्सिस
अंकल के साथ बातचीत किचन में हो रही थी. नार्सिस अंकल मरम्मत के काम में पापा की
मदद कर रहे थे, और चाकू से वॉल-पेपर खुरच रहे थे. वो खुरच रहे थे, और
कह रहे थे, कि ये दीवार समतल है,
जैसी हमारी ज़िंदगी, और
ऐसा कहते हुए मुस्कुरा रहे थे, जैसे कोई बड़ी ज्ञान की बात कह रहे हों. मैंने भी एक
छेनी उठाई और वॉल पेपर खुरचने लगा. मैं चाहता था कि एक ही बार में जितना हो सके
उतना ज़्यादा खुरच दूँ, मगर अंकल नार्सिस ने कहा,
कि इस तरह से वॉल-पेपर खुरचते हुए
मैं इस दीवार से उसी तरह संघर्ष कर रहा हूँ,
जैसे दॉन किहोते ने विण्ड-मिल से
किया था.
“और, इसका
क्या मतलब है: विण्ड-मिल से संघर्ष करना?
और दॉन किहोते कौन था? कहीं
ये शांत-दोन ही तो नहीं?” - कित्ती सारी बातों मे मैं दिलचस्पी ले रहा था.
“कम
ऑन, बेटा!” अंकल नार्सिस हँस पड़े. “ ‘शांत
दोन’ – ये एक नदी है,
जबकि दॉन किहोते – सूरमा. क्योंकि
कोई था ही नहीं जिससे वह लड़ सके, इसलिए उसने विण्ड-मिल के ख़िलाफ़ संअअअ...घर्ष किया” और
नार्सिस ने एक बड़ा टुकड़ा निकाल फेंका, फिर से चहकते हुए,
कि दीवार वैसी ही समतल है, जैसे
ज़िंदगी.
कुछ
देर ख़ामोश रहने के बाद वो आगे कहने लगे,
हालाँकि अब मैं कुछ पूछ नहीं रहा था:
“विण्ड-मिल से संघर्ष करना - इसका मतलब है, बिना
सोचे समझे अपनी ताकत व्यर्थ गँवाना. छेनी के बदले चाकू ले और शांति से खुरच. वर्ना
तो तू दॉन किहोते की तरह बन जाएगा, जिस पर दुल्सेनिया तोबोसो हँसी थी.”
“ये
और कौन है?”
“ये
एक महिला थी, ऐसी, ख़ास!!!” यहाँ अंकल नार्सिस स्टूल से गिरते गिरते बचे, जिस
पे वो खडे थे, और ये ध्वनि ‘ख़ास’ – ज़ाहिर है, इसीने उनकी अपने आपको संभालने में मदद की. वो संभल गए, और
इस तरह आगे कहने लगे, जैसे कुछ हुआ ही न हो: “दॉन किहोते हर जगह उसका पीछा
करता था, जिससे उसकी रक्षा कर सके,
मगर वो उससे दूर भागती थी, नहीं
चाहती थी कि कोई उसकी रक्षा करे.
इसके
बाद नार्सिस ने मुझे दॉन कोहोते के बारे में किताब पढ़ने की सलाह दी. मगर मुझे पढ़ना
अच्छा नहीं लगता, इसलिए मैंने सोचा कि दॉन किहोते के बारे में फ़िल्म
देखना अच्छा रहेगा, और मैं टी.वी. वालों को ख़त लिखने बैठ गया. सीधे चैनल
-1 को.
“नमस्ते!”
मैंने लिखा. “आपको वोलोग्दा का एक स्टूडेण्ट लिख रहा है, जिसका
नाम कोन्स्तांतिन है. अगर मुश्किल न हो,
तो दॉन किहोते के बारे में फ़िल्म
दिखाएँ. किसी भी दिन, मगर बहुत देर से नहीं,
जिससे मैं रात को आराम से सो सकूँ.
अगर आपके पास ये फ़िल्म नहीं है, तो कम से कम ‘शांत दोन’ के बारे में ही दिखा दें,
जिससे मैं समझ सकूँ, कि
दोनों में फ़र्क क्या है”.
तारीख
डाल दी और हस्ताक्षर कर दिए.
और, उन्होंने
‘शांत दोन’ के बारे में फ़िल्म दिखा दी. ये सही है, कि
एकदम नहीं, बल्कि साल भर के बाद. मगर,
चलो,
ठीक है,
ख़ास बात ये है, कि
अब मैं जानता हूँ, कि ‘शांत दोन’ क्या है – ये वहाँ है,
जहाँ कज़ाक लड़ाई-झगड़े करते हैं. मगर, फ़िर
वो ‘शांत’ कैसे हुई? तर्क की दृष्टि से देखा जाए, तो
उसे ‘कोलाहल भरी’
होना चाहिए. सुनने में भी अच्छा लगता
है: ‘कोलाहल भरी दोन’.
और ये ज़्यादा ईमानदार भी है.
जब
मैं दस साल का था, तो मैं तीसरी क्लास में पढ़ रहा था और हम अपनी पसंद के
किसी भी विषय पर निबंध लिखते थे. मैंने प्यार के बारे में लिखने का फ़ैसला किया. और
लिख दिया.
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