वो सुनहरा ज़माना...
ये
उस पुराने ज़माने की बात है, जब टी.वी. पर हाल ही में फ़ैन्टेसी फ़िल्म ‘भविष्य से आए मेहमान’
दिखाई गई थी और सारे बच्चे
स्पेस-पाइरेट्स और रोबो वेर्तेर का खेल खेला करते. लड़कों को फ़िल्म की प्रमुख
हीरोइन एलिस सिलेज़्न्योवा से प्यार हो गया था और लड़कियाँ को – प्रमुख हीरो, कोल्या
गेरासीमोव से...
वोवेत्स
मुझे नौमंज़िला बिल्डिंग की वेल्क्रो नहीं निकालने देता.
वो इस बिल्डिंग में रहता है, और
सोचता है, कि अगर मैं वेल्क्रो निकाल दूँगा, तो
उसे सर्दियों में ठण्ड लगेगी. मगर मैं तो कब से वेल्क्रो को हाथ नहीं लगाता और
वोवेत्स मेरा दोस्त है.
कुछ
ही दिन पहले हम बेंच पे बैठे थे, और वो कह रहा था:
“पता नहीं,
मुझे मॉस्को जाना चाहिए या नहीं.”
“तुझे
क्यों जाना है मॉस्को?” मैं पूछता हूँ. वोवेत्स अपनी पतलून की फ़टी जेब से कई बार मरम्मत किया हुआ बटुआ निकालता है, जिसमें
कभी एक भी पैसा नहीं होता, और मुझे पॉलिथीन के पीछे घुसाई हुई एक छोटी सी तस्वीर
दिखाता है.
“ये, इसके पास,” वो कहता है.
मैं
एक जाना–पहचाना चेहरा देखता हूँ, मगर याद नहीं आता कि ये कौन है.
“कौन है ये?”मैं पूछता हूँ.
मगर
वोवेत्स मेरी तरफ़ ऐसी उलाहने भरी नज़र से देखने लगता है,
कि मुझे फ़ौरन याद आ जाता है.
“-आ-आ! इसी ने तो एलिस
का रोल किया था ‘ भविष्य से आए मेहमान’
में! तू,
क्या,
उसे जानता है?! लगता है, अच्छी ही है,
वोवेत्स!”
“मेरी गर्ल फ्रेण्ड है,” वोवेत्स संजीदगी से कहता है.
“ओह, नो, ऐसा नहीं हो सकता!”
“ओह, नो, ऐसा नहीं हो सकता!”
अचरज
के मारे मैं धीरे-धीरे घास पर लैण्ड करने लगता हूँ. एलिस - वोवेत्स की गर्ल फ्रेण्ड!
“तुम
उससे मिले कैसे ?” मैं पूछता हूँ.
“मैं
नहीं, बल्कि वो. मॉस्को में,
फ़ेस्टिवल में. वो मेरे पास आई और –
बस हमने एक दूसरे को इन्ट्रोड्यूस कर लिया.”
मैं
वोवेत्स से इतनी ईर्ष्या करने लगा! मुझे भी तो एलिस बेहद अच्छी लगती है!
“और
तू,” मैं कहता हूँ,
“अभी भी सोच रहा है, कि
तुझे जाना चाहिए या नहीं?!”
“हाँ,
पता है,”
वोवेत्स ने बटुआ वापस जेब में रख
लिया. “हो सकता है, कि वो ख़ुद ही आ जाए,
बस,
मुझे ये नहीं पता कि कब आएगी... बेहद
चाहती है मुझसे मिलना.”
मैं
घर आता हूँ, और नानी को पूरी-पूरी जानकारी देता हूँ, कि
फ़िल्म ‘भविष्य से आए मेहमान’
वाली एलिस को नौ मंज़िला बिल्डिंग
वाले वोवेत्स से प्यार हो गया है और वो जल्दी ही उसके यहाँ आने वाली है!
“उस वोवेत्स से,”
नानी ने पूछा, “जिसके होंठ मोटे-मोटे हैं?”
“यहाँ मोटे होठों की बात
कहाँ से आ गई!” मैं पूछता हूँ. उसने मुझे अभी-अभी एलिस की फ़ोटो दिखाई है!”
मगर नानी ठहाके लगाने लगी:
“बस, यही बाकी था! एलिस हमारे मोटे-मोटे होठों वाले वोवेत्स को गले लगाएगी! उसे
कोई और नहीं मिला!”
‘हँसने दो, हँसने दो’, मैं सोचता हूँ. ‘मगर
एलिस बस, आ ही जाएगी वोवेत्स से मिलने!’ हाँलाकि जलन तो, बेशक, हो रही
है. वोवेत्स के जूतों में तो लेसेस भी नहीं हैं. वो किसी तार से बँधे हुए होते
हैं. और एलिस को आठ भाषाएँ आती हैं! वो प्लूटो पर भी जा चुकी है. स्पूत्निक लाँच
कर चुकी है, जो सभी आकाशगंगाओं उड़ रहा था और धरती पे
सिग्नल्स भेज रहा था.
मैं और वोवेत्स फ़ोटो प्रिंट करते हैं ....
सन् 1988 में मैंने
फ़ोटोग्राफ़ी सीखी. ये, बेशक, कमाल
की बात थी, मगर इसमें कुछ मुश्किलें थीं. बात ये थी कि उस
समय ऐसे कोई फ़ोटो स्टूडियोज़ नहीं थे, जिनमें फ्लैश की सहायता
से एक सेकण्ड में फ़ोटो प्रिन्ट हो कर निकल आए, दूर दूर तक नहीं
थे. फ़ोटोग्राफ़ बनाने के लिए ज़रूरत थी फ़ोटो एनलार्जर की, लाल
लैम्प की, रील से फ़िल्म दिखाई दे इसलिए एक बेसिन की, फिक्सर की, डेवेलपर की, फ़ोटोग्राफ़िक
पेपर वगैरह की. सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी टाइम की – ये सब करने के लिए. मेरे पास एनलार्जर
को छोड़कर बाकी सब कुछ था, मगर एनलार्जर के बिना तो काम चल ही
नहीं सकता था, और वो खूब महँगा भी था. मम्मा-पापा ने वादा
किया था कि मुझे एनलार्जर देंगे, मगर सिर्फ नए साल पे,
और यहाँ तो मई का महीना आ चुका था. मैं इंतज़ार नहीं कर सकता था,
और अगर मेरा दोस्त वोवेत्स न होता, तो कुछ भी
नहीं हो सकता था.
“चल, मेरे घर में फ़ोटो प्रिन्ट करेंगे?” एक बार वोवेत्स
ने मुझसे कहा. “मेरे पास सब कुछ है, और डेवेलपर भी...”
पहले तो मुझे
वोवेत्स की बात पे ज़रा भी यकीन नहीं हुआ. ये बताना पड़ेगा, कि मेरा
दोस्त काफ़ी अजीब है. मिसाल के तौर पे, कुछ समय पहले उसने कहा
था, कि “ भविष्य से आए मेहमान” वाली एलिस – उसकी गर्ल
फ्रेण्ड है. और सर्दियों में उसने मुझे अपनी नौ मंज़िला बिल्डिंग की वेल्क्रो
खुरचने से मना कर दिया, क्योंकि बिना वेल्क्रो के उसे
सर्दियों में बेहद ठण्ड लगेगी, क्योंकि वो पहली मंज़िल पे जो
रहता है और ज़्यादातर वेल्क्रो उसीकी बाल्कनी के नीचे है. और ये भी, कि वोवेत्स अपने जूतों में लेसेज़ के बदले कोई नीला तार बाँधता है. वोवेत्स
ने कई बार ये भी कहा था कि शहर के किसी स्कूल में कुंग-फू सिखाता है, जिसका कि वो ‘प्रमाणित मास्टर’ है, क्योंकि बहुत बचपन में वो चीन में पढ़ता था,
जब बिल्कुल ही छोटा था. इस बात से भी बहुत शक होता था, क्योंकि, एक बार हमारी कन्स्ट्रक्शन साइट पे बड़े
बदमाश लड़के हमारे सामने आ गए, तो मैं तो उनसे फ़ाइट करना
चाहता था, जबकि मैं कोई मास्टर-वास्टर नहीं हूँ, मगर वोवेत्स भाग गया. हालात को भाँपकर वो बड़ी फ़ुर्ती से वहाँ से भाग निकला,
अपनी एडियों को चमकाते हुए, जिससे उसका
भारी-भरकम बेडौल जिस्म बुरी तरह हिल रहा था.
मतलब, अजीब था
मेरा दोस्त, उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते... उसपे यकीन करना मुश्किल
था, और
मैंने पूछा:
“तू
गप तो नहीं मार रहा है? सही में है डेवेलपर तेरे पास?”
“कसम खाता हूँ. ज़ुबान देता हूँ.”
“तो
फ़ोटो कब प्रिन्ट करेंगे?”
“चाहे
तो कल सुबह आ जा मेरे यहाँ, नौ बजे, रील्स, फ़ोटो-पेपर ले आना, और बस, प्रिन्ट कर लेंगे.”
“ओके, पक्का!” मैं
ख़ुश हो गया और दूसरे दिन सुबह-सुबह मैं चल पड़ा वोवेत्स के घर, रील्स और
फ़ोटो-पेपर लेकर.
वो
बगल वाली नौमंज़िला बिल्डिंग के दूसरे प्रवेश द्वार की पहली मंज़िल पे रहता था, और मैं
ख़ुश-ख़ुश उसके यहाँ जा रहा था – क्योंकि मेरे सीधे-सादे कैमेरे – 'स्मेना' से खींचे गए
सारे फ़ोटो अब सचमुच के फोटोज़ में बदलने वाले थे.
“आ
जा,'' वोवेत्स ने दरवाज़ा खोला. “सिर्फ किसी भी बात पे हैरान न
होना और बेवकूफ़ी भरे सवाल मत पूछना. प्रिन्टिंग बाथरूम में करेंगे. लाल लैम्प है, तो तू
परेशान न होना, सब कुछ सही-सही हो जाएगा.”
मगर
किसी भी बात पे हैरान न होना काफ़ी मुश्किल था. बात ये नहीं थी कि वोवेत्स के
क्वार्टर में सब कुछ बेतरतीब था, बस ऐसा लग रहा था कि हर कमरे में, कॉरीडोर में
और किचन में भी कई सारे शहीद-मृतक घुस आए हों, इतनी
बेतरतीबी से चीज़ें फ़िकी हुई थीं. पलंगों और दीवानों की टाँगें ही नहीं थीं. और हर
कमरे में (कुल दो कमरे थे) इस सब ख़ुशनुमा माहौल में, एक-एक काली
बिल्ली बैठी हुई थी.
“दोनों
के बदन पे पिस्सू हैं,'' वोवेत्स ने पहले ही आगाह कर दिया.
बड़ा
अजीब लग रहा था. मेरा मन मुझसे कह रहा था, कि इस क्वार्टर में कुछ भी हो सकता था, अच्छा भी, और अच्छा
नहीं भी. वैसे उम्मीद तो अच्छा न ही होने की थी. चारों ओर की हर चीज़ जैसे ख़तरनाक
उत्तेजना से लबालब थी. कुछ देर के लिए तो मैं भूल ही गया कि यहाँ क्यों आया हूँ.
“कुछ
खाएगा?” वोवेत्स
ने पूछा.
“नहीं!” मैं करीब-करीब चिल्ला पड़ा. वो किस तरह
का खाना खाता था – सिर्फ ख़ुदा ही जानता है, और
वैसे भी एक भी आदमी इस घर में कुछ खाने या पीने का ख़तरा मोल नहीं लेगा. “नहीं,” मैंने दुहराया, “चल, फ़ोटोग्राफ़्स
प्रिन्ट करते हैं.”
“चल, चल,” न जाने क्यों वोवेत्स हँस पड़ा.
“तू गंदगी पे ध्यान मत दे, मेरे यहाँ हमेशा ऐसा ही रहता है. मैं छोटी-छोटी बातों पे अपना दिमाग नहीं
खपाता हूँ. अब मुझे याद आया, कि वोवेत्स ने एक बार मुझसे कहा
था, जैसे उसके पास बैंक में पंद्रह हज़ार पड़े हैं, और मैंने पूछ लिया:
“तेरे पास तो बैंक में पंद्रह हज़ार पड़े हैं, मगर सारे पलंग तो बिना टाँगों के हैं?”
“ऐसा ही होना चाहिए,” वोवेत्स ने भेदभरे अंदाज़ में जवाब दिया. “तू क्या पलंग देखने आया है?”
मैंने सोचा कि वो ठीक कह
रहा है और आसपास की चीज़ों पर ध्यान देना बस हो गया, बल्कि अब
मुझे काम की ओर ध्यान देना चाहिए.
मगर ये काम हुआ किस तरह –
ये एक अलग ही किस्सा है!
जब हम बाथरूम में गए और
किन्हीं बेसिन्स और अनगिनत झाडुओं और ब्रशों के बीच, जो
वोवेत्स को जान से भी प्यारे नज़र आ रहे थे, लाल बल्ब को
जलाकर दूसरी लाईट बुझा दी, तो मेरा दोस्त अचानक बेहद ख़ुश हो
गया. कहना पड़ेगा कि ऐसा उसके साथ अक्सर नहीं होता था और, ज़ाहिर
था, कि ये किसी अच्छी बात की ओर इशारा नहीं करता था.
“कुंग-फू दिखाऊँ?” आँख़ मारते हुए वोवेत्स ने पूछा.
“प्लीज़, अगली बार?” मैंने
सावधानी से कहा, ये समझते हुए भी कि, मैं
चाहे कुछ भी कहूँ, कुंग-फू तो ज़रूर होगा ही होगा. वोवेत्स स्टैण्ड
पर खड़ा हो गया, टब के पास पड़े हुए एक छोटे से खाली बेसिन को
उल्टा करके (वोवेत्स के क्वार्टर में कमोड और बाथ एक साथ हैं).
“वोवेत्स, कोई ज़रूरत नहीं है!” मैं चिल्लाया.
“मैं-ए-ए!!!”
वोवेत्स ने साइड में लात घुमाई, और फ़िक्सर्स समेत बेसिन बाथरूम के फ़र्श पर नज़र
आया.
“ईडियट!”
मैं दहाड़ा. “तूने क्या कर दिया?!”
वोवेत्स
गंभीर हो गया.
“दहाड़
मत,''
उसने इत्मीनान से कहा और कुछ देर रुककर, जिसके दौरान उसके चेहरे पर अपराध की भावना दौड़ गई, आगे कहा: “ तूने ज़िंदगी में कितनी बार फ़ोटोज़ प्रिन्ट किए
हैं?
''
“दूसरी बार कर रहा हूँ,” मैंने ईमानदारी से स्वीकार किया.
“जभी. और मैं पाँच
हज़ार बार कर चुका हूँ,”
वोवेत्स ने घमण्ड से कहा. “ ऐसा होता है, कि
कभी बाइ चान्स फिक्सर गिर जाता है. वो इतना ज़रूरी नहीं है. डेवेलपर तो है!”
मुझे फिर भी गुस्सा आ ही
रहा था, क्योंकि मुझे अब अफ़सोस
होने लगा था कि मैं वोवेत्स के घर क्यों आया, मगर जल्दी ही हम सीधे काम पे लग
गए.
सात मिनट तक तो काम
ठीक-ठाक चलता रहा. पाँच फ़ोटोज़ तो करीब-करीब तैयार हो गए थे, बस उन्हें सुखाना बाकी था, मगर फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसके लिए ही मैं ये सारा किस्सा
बताने के लिए तैयार हुआ. वोवेत्स ने अचानक फ़र्श से कोई धूल भरी चीज़ उठाई और चीखते
हुए: “जा नहीं पाएगा! कैसे भी तुझे ख़तम कर दूँगा! एक भी कमीना बचकर नहीं जाएगा!”
वो किसी गंदगी से धूल हटाने के लिए, बाथरूम
के फ़र्श पर पानी बिखेरने लगा.
“तू क्या कर रहा है?!” मैं बिसूरने लगा.
“तिलचिट्टे, क्या तू देख नहीं रहा?! ति-इ-ल-च-ट्टे!”
और धूल झटकना जारी रहा.
मैं तीर की तरह बाथरूम से
भागा, क्योंकि मैं इस सबसे बेज़ार
हो गया था. वहाँ से एक मिनट तक चीखें आती रहीं, फिर वोवेत्स प्रकट हुआ और जैसे
कुछ हुआ ही न हो, इस अंदाज़
में बोला:
“ मास्क पहनकर फ़ोटोग्राफ़्स
प्रिन्ट करना जारी रखेंगे. ये लिक्विड ख़तरनाक है.”
मैं न जाने क्यों राज़ी हो गया. वोवेत्स कमरे से दो हरे मास्क्स खींच लाया, और हम फिर से बाथरूम में घुसे. मास्क के कारण साँस लेने में
मुश्किल हो रही थी, मगर फ़ोटो प्रिन्ट करने की
चाहत अभी भी बाकी थी.
बोलना नामुमकिन था. बर्दाश्त से बाहर ऊमस थी. मगर फिर भी कुछ नए फ़ोटोग्राफ़्स
तैयार हो गए थे...
मई का महीना. बाहर धूप और गर्माहट थी, बच्चे साइकिलों पर घूम रहे हैं. निकोलाएव स्ट्रीट पर पुरानी नौमंज़िला इमारत के
गंदे क्वार्टर में, पहली मंज़िल पर, बाथरूम में, लाल
लैम्प की रोशनी में और डिब्बों से, बेसिन्स
से और झाडुओं और मॉपर्स से घिरे हुए, सिकुड़ते
हुए और बेहद मुसीबतों को झेलते हुए, मास्क
पहने दो लड़के बैठे हैं और फ़ोटोग्राफ़्स प्रिन्ट कर रहे हैं. बेवकूफ़ी है. ऐसा तो
चार्म्स की कहानियों में भी नहीं मिलता...
“मास्क उतार दे, मैं मज़ाक कर रहा था,” चालाकी से और बेशरमी से वोवेत्स मुस्कुराया, जब वो समझ गया कि मेरा दम घुट रहा है.
“मज़ाक कर रहा था से क्या मतलब?'' मैंने
मास्क उतार कर पूछा.
“अरे, मैंने
सीधा-सादा पानी ही डाला था, सिर्फ कब से कोई मज़ाक नहीं
किया था. इतवार को आ जा, अच्छे से प्रिन्ट करेंगे. मम्मा-पापा घर में
होंगे, उनके सामने मैं कोई कुँग-फू नहीं दिखाता और मास्क
लाने की भी मुझे इजाज़त नहीं है. वे रजिस्टर में लिखे हुए हैं.”
“डेविल!” मैं गरजा. “और क्या तेरा नाम बाइ चान्स
पागलों के डॉक्टर के रजिस्टर में नहीं है?!!”
“प्लीज़, गुण्डागर्दी नहीं. मेहमान नवाज़ी के नियमानुसार मैं तुझे जवाब नहीं दे सकता,
मगर अगर कोई चीज़ अच्छी नहीं लगी हो, तो दफ़ा हो
जा.
दाँत भींचकर और बिना एक भी
लब्ज़ कहे,
मैंने अपनी रील्स उठाईं और तीस सेकण्ड में बाहर आ गया.
बहुत बुरा मन हो रहा था.
थैन्क्स गॉड, शाम को, जब पापा ऑफ़िस से
आए, तो हम जीन-पॉल बेल्मोन्दो की फ़िल्म “अलोन” देखने गए जिसे हम दोनों बहुत प्यार करते थे. उस समय मैंने पक्का इरादा कर
लिया, कि अब फ़ोटोग्राफ़्स भी अकेले ही प्रिन्ट करना होगा. और
वोवेत्स – मैं उससे अब कभी नहीं मिलूँगा...
एक हफ़्ते बाद मैं फिर से
वोवेत्स से कम्पाऊण्ड में बात करने लगा और उसने फिर से साबित कर दिया कि वो
कुँग-फू का मास्टर है. ‘हो सकता है कि कुँग-फू के सारे
मास्टर्स मास्क पहन कर फ़ोटोग्राफ़्स प्रिन्ट करते हों और झूठ बोलते हों कि उनकी
फ़िल्म- स्टार्स से दोस्ती है?” मेरे दिमाग़ में ये ख़याल कौंध
गया...
तो ये था किस्सा. क्या ये
दुखभरा था या मज़ाहिया?
ईमानदारी से कहूँ, तो मुझे भी समझ में नहीं आएगा!
मैं परामनोवैज्ञानिक (हीलर) कैसे बना....
जब
मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था, तो टी.वी. पर करीब-करीब हर रोज़ हर तरह के मैजिशियन्स, जादूगर
और परामनोवैज्ञानिक (हीलर्स) दिखाए जाते थे. वे सारी बीमारियाँ ठीक कर सकते थे.
सिर्फ हाथों को हिलाएँगे या शब्दों
में हिदायतें देंगे, और आपका हर मर्ज़ फ़ौरन रफ़ू चक्कर हो जाएगा. अगर आपको उन
पर भरोसा न हो तो भी. ख़ास कर दो हीलर्स को अक्सर दिखाया जाता था – कश्पीरोव्स्की
को और चुमाक को. चुमाक सफ़ेद बालों वाला था और उसका प्रोग्राम सुबह के समय होता था, वो
सिर्फ हवा में हाथों को हिलाया करता ( क्रीम ‘चार्ज’ करता, पानी – मतलब जो भी टी.वी. के पास रखो, वो
‘चार्ज’ कर देता), और कश्पीरोव्स्की शाम को ‘हील’ किया करता, उसके बाल काले थे और वो मौखिक हिदायतें दिया करता.
मैंने
उन्हें देखा, देखा और सोचा: मैं उनके जैसा अति-संवेदी क्यों नहीं
हूँ? वो भी तो कभी स्कूल में ही पढ़ते थे और अपनी आश्चर्यजनक
योग्यताओं के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे. हमारे स्कूल में हर शुक्रवार को ‘क्लास-एक्टिविटी’ होती
थी. मैंने फ़ैसला कर लिया कि इस शुक्रवार को मैं ‘शो’ करूँगा. इसी बहाने माशा मलोतिलोवा भी जान जाएगी कि मैं
कोई ऐसा-वैसा लड़का नहीं हूँ, बल्कि असली ‘हीलर’ हूँ. माशा मलोतिलोवा हमारी क्लास की सबसे अच्छी लड़की
है, मगर, फ़िलहाल, इस बारे में कुछ नहीं बताऊँगा.
मैं अपनी क्लास-टीचर ल्युदमिला मिखाइलोव्ना के पास गया और कहा कि ऐसी-ऐसी
बात है, क्या
शुक्रवार को एक्टिविटी-टाइम में हीलिंग शो कर सकता हूँ? पहले तो वो हँसी, फिर पूछने लगी कि क्या ये ‘हीलिंग़’ का गुण मुझमें काफ़ी पहले से है, मगर फिर उसने इजाज़त दे दी. मुझे, सही में, झूठ बोलना पड़ा कि मैं करीब छह महीने से पानी ‘चार्ज’ करता हूँ और मैंने अपने अंकल का अल्सर ठीक कर दिया था.
गुरूवार को, जब 'शो' में
एक ही दिन रह गया था, तो मैंने सोचा कि थोड़ी रिहर्सल कर लूँ. मैं कैसेट-प्लेयर के सामने बैठ गया और,
ये कल्पना करते हुए,
कि मेरे भीतर से
स्ट्राँग-पॉज़िटिव एनर्जी निकल रही है, मैं अपने सामने हाथों को हिलाते हुए कहने लगा:
“आँखें बंद करो,'' मैंने
कहा. “आप एक बड़ा सफ़ेद कमरा देख रहे हैं, जो रोशनी से लबालब भरा है. आप
कमरे में हो. आप कमरे के बीचोंबीच हो. आप एक साइड से अपने आप को देख रहे हो, आप
जैसे काँच के बने हो. सफ़ेद, भारहीन प्रकाश आपके शरीर को गर्माहट से भर रहा है.
हल्की-हल्की हवा चल रही है. शरीर के उन भागों में, जहाँ
भारीपन है, ज़्यादा-ज़्यादा प्रकाश एकत्रित हो रहा है और भारीपन ग़ायब हो
रहा है. आप अच्छा महसूस कर रहे हैं. गर्माहट महसूस कर रहे हैं.”
मैंने हाथों को कुछ और तनाव दिया, उन्हें
झटका और अपना कहना जारी रखा:
“हवा कमज़ोर पड़ रही है. आप उसे मुश्किल से महसूस कर रहे हैं.
आप इस स्थिति में जितना संभव हो, उतनी ज़्यादा देर तक रहना चाहते हैं. मगर प्रकाश बिखरने लगता
है. वह लुप्त हो जाता है, अपने साथ आपकी सारी तकलीफ़ें ले जाता है. आपका शरीर शांत है
और स्वच्छ है...”
मैं
करीब आधे घण्टे तक बोलता रहा, जब तक
कि दरवाज़े की घण्टी नहीं बजी. पड़ोस वाला मक्सिम मुझे घूमने के लिए बुलाने आया था.
मैंने कहा कि इस समय मैं नहीं आऊँगा, मैं उसे खींचकर अपने कमरे में ले आया, मैंने उसे समझाया कि बात क्या है, और उसके सामने 'शो' वाला टेप-रेकॉर्डर रख दिया.
मक्सिम ने आज्ञाकारी बच्चे की तरह आँख़ें बंद कर लीं, बिना हिले पूरी कैसेट सुनी और
बोला:
“व्वा, तू तो कश्-पी-र है! बल्कि उससे भी ज़्यादा स्मार्ट है! सुप्पर! पता है, जब मैं तेरे यहाँ आया, तब मेरे सिर में दर्द हो रहा था, मगर अब – जैसे हाथ फेर कर दर्द
निकाल लिया हो!”
मैंने सोचा, चलो, सब ठीक है, मतलब, कल सब अच्छा हो जाएगा.
शुक्रवार को सभी क्लासेज़ के दौरान मैं बस
एक्टिविटी-टाइम के बारे में ही सोचता रहा. मेरे क्लासमेट्स ने पहली ही क्लास के
पहले पानी से भरे डिब्बे और क्रीम की ट्यूब्स दिखाईं, जिन्हें 'चार्ज' करना था, और हालाँकि कल की रिहर्सल बढ़िया
ही हुई थी, मगर मैं बेहद परेशान था. जब एक्टिविटी-टाइम शुरू हुआ और ल्युदमिला
मिखाइलोव्ना ने टीचर वाली मेज़ के पीछे की जगह मुझे दे दी, तो उन डिब्बों और ट्यूब्स के
पीछे से मैं करीब-करीब दिखाई ही नहीं दे रहा था और मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा
था कि जैसे पागल हो गया हो.
“आँखें बंद
करो,'' मैंने कहना शुरू किया. “एक सफ़ेद बड़ा कमरा है, आप उसके भीतर हो. आप, जैसे काँच के बने हो. प्लीज़, गंभीरता बनाए रखें...”
सबसे पहले तो कोई आँख़ें बंद ही नहीं करना चाहता था, और दूसरे, चाहे मैं कितनी ही शिद्दत से
समझा रहा था, कि उनकी हँसी से मेरी एनर्जी के प्रवाह में बाधा पड़ रही है, सब लगातार हँस ही रहे थे और चिढ़ा
रहे थे. शुरू में तो ऐसे हालात में मैं 'शो' करता रहा. अगर सिर्योझा
बोन्दारेव ने गड़बड़ न की होती, तो सब कुछ ठीक-ठाक हो गया होता, मगर जब मैंने कहा कि 'आपका शरीर शांत और स्वच्छ है, बीमारियाँ काले पदार्थ के रूप में उसे हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हैं', तो सिर्योझा, जो आमतौर से एक शांत बच्चा है, इतनी ज़ोर से ठहाके लगाने लगा कि
पूरा स्कूल बस गिरते-गिरते बचा. और सबने उसका साथ दिया. इतनी ज़ोर से ठहाके लगाने
लगे कि खिड़कियों के शीशे झनझनाने लगे, जैसे वे पहले सोच ही नहीं सके कि दुनिया में मेरे 'शो' से बड़ी मज़ाकिया चीज़ कोई और हो
सकती है. ल्युदमिला मिखाइलोव्ना क्लास के दरवाज़े में खड़ी होकर प्यार से मेरी तरफ़
देख रही थीं, आख़िर में तो मैं ख़ुद भी हँसने लगा, मगर फिर मैंने घोषणा की कि चाहे
कुछ भी हुआ हो, क्रीम्स और पानी 'चार्ज' हो गए हैं.
मतलब, मुझे मालूम नहीं है कि मैं अति-संवेदी हूँ या नहीं. मेरा 'शो' चाहे फ्लॉप हो गया हो, मगर सोमवार को माशा मलोतिलोवा ने
भी कहा, कि अब उसकी तबियत पहले से बेहतर है.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें