मैंने फ़ुटबॉल मैच देखा
फ़ुटबॉल
मैच चल रहा था. चैनल 1 पे, जैसा कि होता है, शाम को, प्राइम टाइम में. और क्या! स्पार्ताक और सेस्का ( सेस्का
- सेंट्रल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ आर्मी – रूस का बेहद पुराना क्लब) के बीच मुकाबला
होने वाला था! हमारी रशियन चैम्पियनशिप का सबसे इम्पॉर्टेन्ट मैच!
“लुझ्निकी”
स्टेडियम खचाखच भरा था.
मैच
से आधा घण्टा पहले हर तरह के इण्टरव्यू दिखाते रहे, जर्नलिस्ट
लोग मैच के रिज़ल्ट का अनुमान लगा रहे थे और टीमों की स्थिति पर चर्चा कर रहे थे –
मतलब, मूड
बिल्कुल फुटबॉल-फ़ेस्टिवल जैसा हो रहा था.
मैं
बड़े गौर से टेलिकास्ट देख रहा था और मैच शुरू होने तक ये तय नहीं कर सका था, कि मैं
किसका 'फ़ैन' होऊँगा. मगर
फिर, मैंने
'स्पार्ताक' को चुना, क्योंकि बात
ये थी, कि
मैं 'स्पार्ताक' के एक पुराने, मशहूर
खिलाडी – फ़्योदोर चेरेन्कोव को व्यक्तिगत रूप से जानता था. और जैसे ही मुझे याद
आया कि फ़्योदोर कितना ग़ज़ब का इन्सान है, जैसा बिरला ही कोई होता है, तो मुझे लगा
कि 'स्पार्ताक' का फ़ैन होना
मेरा कर्तव्य है! और, ये इसके बावजूद कि वो पूरे देश में मशहूर है.
कमेन्टेटर
ने टी.वी. के दर्शकों से 'हैलो' कहा, और खेल शुरू हुआ. ठीक तीसरे मिनट पे 'स्पार्ताक' के
स्ट्राइकर ने 'सेस्का' के गोल-कीपर अकीन्फ़ेयेव को गहरी चोट पहुँचाई. अकीन्फ़ेयेव घास पे पड़ा था और दर्द से
तड़प रहा था. स्ट्रेचर लाया गया. 'सेस्का' के गोल-कीपर को होश में लाने की कोशिश करने लगे. मगर
स्पार्ताक का स्ट्राइकर पास ही में खड़ा-खड़ा देख रहा था, उसे अकीन्फ़ेयेव
पे इत्ती सी भी दया नहीं आ रही थी. वो बस हँसने ही वाला था!
मैं
भी ये ही सोच रहा था. जब 'स्पार्ताक' के स्ट्राइकर्स इतने बेरहम हैं, तो मैं 'स्पार्ताक' का 'फ़ैन' नहीं बनूँगा. बेचारे
गोल-कीपर को इत्ती चोट पहुँचाई और इसके दिल में कोई हमदर्दी भी नहीं है!
मैं 'सेस्का' का फ़ैन
बनूँगा.
मगर
तभी एक और नाटक हुआ. हाइलाईट्स के साथ दिखा रहे थे कि कैसे ज़ख्मी अकीन्फ़ेयेव को
स्ट्रेचर पे बाहर ले जा रहे हैं, और उसे चिल्लाते हुए सुनना भी अच्छा लग रहा था. वो
चीख़-चीख़कर 'स्पार्ताक' के स्ट्राइकर से इतने ख़तरनाक लब्ज़ कह रहा था, कि मैं
उन्हें यहाँ लिख भी नहीं सकता. किताबों में ऐसे लब्ज़ छापे नहीं जाते. 'सेस्का' का ज़ख़्मी
गोल-कीपर बड़ी देर तक, ऊँची आवाज़ में और खूब कोशिश करके बता रहा था, कि वो, स्ट्राइकर
असल में कौन है, जिसने उसे चोट पहुँचाई थी, और उसके
सारे रिश्तेदार, दोस्त और जान-पहचान वाले लोग कौन हैं और उसने धमकी दी, कि सबको
ज़िंदा गाड़ देगा!
नहीं, मैंने सोचा, ऐसी टीम का 'फ़ैन' तो मैं नहीं
बनूँगा, जिसका
गोलकीपर इतना दुष्ट है. मैं 'स्पार्ताक' का ही 'फ़ैन' बना रहूँगा. और चेरेन्कोव बढ़िया आदमी है, और वैसे भी, क्या कोई इस
तरह से गालियाँ दे सकता है!
तभी 'स्पार्ताक' ने गोल बना
लिया. और वेल्लितन, और दूसरे स्पार्ताकियन्स ग्राऊण्ड के किनारे पे ख़ुशी का
डान्स करने लगे. आह, कितनी बदहवासी से वे डान्स कर रहे थे! बस, भयानक शोर
और हल्ला-गुल्ला! बेहद बनावटी जोश से.
ख़ुशी
पागलपन की हद तक पहुँच गई थी. उन्होंने अपने टी-शर्ट्स उतार कर फेंक दिए, शॉर्ट्स
नीचे खिसका लिए – मतलब, बड़ी डरावनी बात हो रही थी. 'स्पार्ताक' के फ़ैन्स की
गैलरी भी पागल हो गई, और फिर उन्होंने मशालें जला दीं, जिनसे इतना
धुँआ निकलने लगा, कि ग्राउण्ड भी नहीं दिखाई देता था. कमेन्टेटर ने यही कहा:
“ मैदान ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है. कमेन्ट्री करना बेहद मुश्किल हो रहा है.”
फिर
स्पार्ताकियन्स 'सेस्का' के फ़ैन्स की गैलरी के पास गए और नाक-मुँह चिढ़ाने लगे. ऐसा
ऐसा होता रहा.
'नहीं', मैंने सोचा, बेहतर है कि मैं 'सेस्का' का ही फ़ैन बना रहूँगा. वैसे भी अकीन्फ़ेयेव को भी ज़ख़्मी किया
गया था, और 'सेस्का' के
खिलाड़ियों ने अपने शॉर्ट्स नीचे नहीं खिसकाए थे.
मगर
बीस मिनट बाद ही कुछ और बात हुई. ख़ैर, सच्ची में कहूँ, तो कई सारे फुटबॉल-प्रेमियों की राय में, हो सकता है, कि कोई भी
ख़ास बात नहीं हुई, मगर मुझ पर तो, जो मैंने देखा, उसका न जाने क्यों काफ़ी असर हुआ.
'सेस्का' के चीफ़-ट्रेनर को दिखा रहे थे. उसने बड़ी अच्छी तरह से देखा
था, कि
उसे टी.वी. पर दिखाया जा रहा है, मगर इससे कोई फ़रक नहीं पड़ा, और उसने
कैमेरे के सामने पूरी ताकत से नाक छिनक दी, वो भी सीधे उस ख़ूबसूरत और ख़ास तरह से बनाई गई ट्रेडमिल पर, जिस पर वो
खड़ा था. मैं ताव खा गया. क्या ऐसा करना चाहिए?! कम से कम
रूमाल ही निकाल लेता! मगर, ये तो सीधे ट्रेडमिल पर! नहीं, मैंने सोचा.
मैं 'सेस्का' का 'फ़ैन' नहीं बनूँगा. 'स्पार्ताक' का ही 'फ़ैन' बना रहूँगा.
कम से कम उनका ट्रेनर तो साफ़-सुथरा है...
फिर 'सेस्का' ने भी एक
गोल बनाया. और 'सेस्का' के खिलाडियों ने बेहद शराफ़त से अपनी जीत का जश्न मनाया.
उन्होंने, मिसाल के तौर पर, अपनी जर्सियाँ नहीं उतार फेंकी. मगर 'स्पार्ताक' के 'फैन्स', ज़ाहिर है, 'सेस्का' के
खिलाडियों से चिढ़कर, और ज़्यादा मशालें जलाने लगे और ऊपर से ग्राउण्ड पर टॉयलेट
पेपर के रोल्स फेंकने लगे.
“आह, ये कितना
भद्दा है,” कमेन्टेटर
ने शिकायत के लहजे में कहा, “ ‘स्पार्ताक’ के 'फ़ैन्स' का ये काम!
दोस्तों, ग्राउण्ड पर टॉयलेट पेपर के रोल्स फेंकना!”
बहस
का सवाल ही नहीं, मैं कमेन्टेटर से पूरी तरह सहमत था! नहीं, मैं 'सेस्का' का ही “फ़ैन' बनूँगा.
उनके फ़ैन्स कम से कम टॉयलेट पेपर तो ग्राउण्ड पर नहीं फेंकते!
मगर
दूसरी तरफ़, फ़्योदोर चेरेन्कोव – कितना अच्छा इन्सान है...और हो सकता है, कि 'स्पार्ताक' का स्ट्राइकर, मैच के शुरू
में, 'सेस्का' के गोल कीपर को चोट पहुँचाना नहीं चाहता हो...फिर भी 'स्पार्ताक' का ही 'फ़ैन' रहूँगा...
या 'सेस्का' का?
इसके
बाद 'सेस्का' ने एक और
गोल बनाया. 'स्पार्ताक' ने ये गोल फ़ौरन उतार दिया, और मैच 2:2
के स्कोर से ख़तम हुआ.
थैन्क्स
गॉड! आख़िर ख़तम तो हुआ! थैन्क्स कि लाज रख ली. वर्ना तो मैं तय ही नहीं कर पाता, कि मुझे
किसका 'फ़ैन' होना चाहिए, और आख़िर में
ख़ुश होना चाहिए या अफ़सोस करना चाहिए!
जैसे
ही मैच ख़तम हुआ, मुझे न्यू क्वार्टर्स वाले तोल्या लूकोव ने फ़ोन किया. न्यू
क्वार्टर्स हाल ही में बनाए गए हैं, ट्राम वाले स्टॉप के पीछे.
“सेरी, तू किसका 'फ़ैन' था?” उसने पूछा.
और
वो तो फुटबॉल का इत्ता शौकीन है, कि उसके
अलावा उसे कुछ और दिखाई ही नहीं देता. बड़ा होकर फुटबॉल प्लेयर बनना चाहता है और वो
स्पोर्ट्स स्कूल 'स्मेना' में पढ़ता है.
“तोल्यान,” मैंने
ईमानदारी से कहा, हालाँकि
मैं ये भी समझ रहा था, कि इसका
नतीजा कुछ भी हो सकता है, “प्लीज़, मुझे ये बताओ, कि वो सब वहाँ थूक क्यों रहे थे, टॉयलेट पेपर
क्यों फ़ेंक रहे थे, पतलूनें क्यों उतार रहे थे? क्या फुटबॉल
में ये सब होता है?”
“तू
क्या कह रहा है!!!” तोल्या गुस्से से चीख़ा. “क्या बढ़िया खेल था! ये थूकना कहाँ से
हुआ?
क्या तेरा दिमाग चल गया है? अब तो मैं तुझसे
कभी बात भी नहीं करूँगा. तुझे तो सिर्फ बैले देखना चाहिए, फुटबॉल
नहीं!” और उसने रिसीवर रख दिया.
और मैं सोच रहा हूँ, कि वाकई में बैले देखना ज़्यादा अच्छा रहेगा. वहाँ कोई धुँआ तो नहीं पैदा
करेगा. बैले, शायद, अच्छी चीज़ है. बस
एक ही बात, जो मुझे वहाँ अच्छी नहीं लगती, वो ये है, कि सारे लड़के कसी हुई पतलूनों में छलाँगें
लगाते हैं. वो अच्छा नहीं लगता. और छैला बाबू भी! जैसे मामूली पतलूनें पहन ही नहीं
सकते!
मेरा प्यार.....
ये
उन गर्मियों की बात है, जब मैं और
तान्या पद्गरदेत्स्काया साथ-साथ कम्पाउण्ड में घूमा करते थे और तान्या मुझे
सील फ़िश (अजीब, अनाडी लडके को सील फिश कहकर चिढ़ाते
हैं – अनु.) कहती थी, और ये देखकर खूब
हँसती थी, कि मुझे अपने सील फ़िश जैसा होने पर अचरज होता है.
एक बार शाम को हमने शादी
करने का फ़ैसला किया. ये बात तो साफ़ ज़ाहिर थी, कि हम एक दूसरे
से बेहद प्यार करते हैं, मगर हमें पक्का पता था, कि हमारे माँ-बाप कभी भी राज़ी नहीं होंगे. बात ये है, कि मेरी मम्मा शहर के एक इन्स्टीट्यूट में लिटरेचर की टीचर थी और इस वजह
से तान्या के माँ-बाप उसे ‘बुद्धिजीवी’ कह कर गाली देते थे. इस लब्ज़ का क्या मतलब होता है – ये तो मुझे समझ में
नहीं आता था, मगर मुझे इतना पता था, कि
तान्या के माँ-बाप मेरी मम्मा से दोस्ती करने के बजाय फाँसी ही लगा लेंगे. मेरे
पापा भी तान्या के माँ-बाप के बारे में ऐसी ऐसी बातें कहते थे, जिन्हें आम किताबों में नहीं लिखा जाता, और समझ में
नहीं आता था, कि क्या वह मम्मा को बचा रहे हैं, या उन्हें भी तान्या के माँ-बाप अच्छे नहीं लगते.
मतलब, हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता था. भाग जाने का.
मुझे हमारी बिल्डिंग के
पीछे वाली बगिया में एक ख़ुफ़िया जगह मालूम थी, जब तक सर्दियाँ
शुरू नहीं हो जातीं, वहाँ पर रहा जा सकता था. आगे की देखी
जाएगी.
“तो, तान्,” मैंने अपनी मंगेतर से पूछा, “क्या तुम हमेशा मेरे साथ रहने के लिए तैयार हो, दुख
में भी और सुख में भी?”
“ठीक है, कोई प्रॉब्लेम नहीं,” तान्या पद्गरोदेत्स्काया ने
संजीदगी से जवाब दिया.
और हम चल पड़े.
उस ख़ुफ़िया जगह पर पहुँचे, और तभी
तूफ़ान शुरू हो गया. बिजली कड़कने लगी, धरती हिलने लगी,
या तो डर के मारे या ख़ुशी के मारे. और हम एक दूसरे से चिपक कर एक
बड़े ठूँठ पे बैठे हैं, जो एक बड़े पेड़ को छीलने के बाद बचा था
या हो सकता है, उसे सही-सही काटा गया हो.
“तान्,” मैंने
कहा, “तू जान ले कि तेरे लिए मैं अपनी ज़िंदगी कुर्बान करने
के लिए तैयार हूँ!”
“ये ठीक है. मगर, अगर तुमने
ज़िंदगी कुर्बान कर दी, तो फिर मेरा ख़याल कौन रखेगा? मेरा तो अब तुम्हारे सिवा कोई भी नहीं है!”
“अरे नहीं, मैं ख़याल
भी रखूँगा, मगर सच में, अगर ज़रूरत पड़ी
तो ज़िंदगी भी कुर्बान कर दूँगा!”
“सुन,” तान्या
ने काफ़ी तीखे सुर में कहा, “तू एकदम बेवकूफ़ है! तुझे तो
सिर्फ ज़िंदगी ही कुर्बान करने का शौक चढ़ा है, मगर किसलिए –
ये महत्वपूर्ण नहीं है!”
“सही है,” न जाने
क्यों मैं सहमत हो गया. “तब नहीं करूँगा कुर्बान. चौरानवें साल जिऊँगा, परदादी की तरह, और जब तक सबको दफ़ना न दूँगा –
नहीं मरूँगा.”
“ये हुई न बात,” तान्या मुस्कुराई.
कुछ समय तक हम, किसी बकवास
फिल्म के नायक-नायिका की तरह, एक दूसरे की पीठ से पीठ सटाए,
चुपचाप बैठे रहे और सिरफिरी बारिश में भीगते रहे. फिर तान्या ने
कहा:
“सुन, मुझे थोड़ी
ठण्ड लग रही है.”
“और मुझे भी,” मैंने
कहा.
कुछ और देर ख़ामोशी छाई
रही. फिर मैंने कहा:
“सुन तान्, चल वादा
करते हैं, कि आज से ठीक तेरह साल बाद, जब
हम अठारह साल के हो जाएँगे, तो हम ठीक इसी जगह पे मिलेंगे,
रजिस्ट्रेशन ऑफ़िस जाएँगे और तब पक्का शादी कर लेंगे, मगर फ़िलहाल बिदा लेना होगा – अपने अपने घर जाएँगे.”
“बिल्कुल, ऐसे ही?”
तान्या ने पूछा.
“ऐसे ही,” बेहद
आत्मविश्वास से मैंने जवाब दिया, क्योंकि अब ठण्ड के साथ भूख
भी लगने लगी थी.
“ख़ैर, ये कोई
अच्छी बात नहीं हुई,” तान्या ने जवाब दिया. “एक घण्टा भी साथ
नहीं रहे...” और जैसे वो पल भर के लिए गुस्सा हो गई, मगर
फ़ौरन संभल गई: “वैसे, तू ठीक ही कह रहा है, बेशक. मगर तेरह साल बाद – एक्ज़ेक्ट्ली? ठीक इसी जगह?”
“ सूरमा का प्रॉमिस,” न जाने
कैसे मेरे मुँह से निकल गया, हालाँकि मैं ये भी नहीं जानता
था, कि सूरमा क्या होते हैं...
तूफ़ान पहले ही की तरह
चिंघाड़ रहा था,
और हम, पूरी तरह भीगे हुए और ख़ुश, अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े. और जब मैंने अपने क्वार्टर की घंटी बजाई,
मुझे न जाने क्यों पल भर के लिए डर लगा: मैं तो ठीक तेरह साल बाद उस
जगह पहुँच जाऊँगा, जहाँ हम गए थे – मैंने प्रॉमिस भी किया है,
मगर अगर तान्या इस दौरान ये सब भूल गई तो?...
मगर मैंने जल्दी से इस
बारे में सोचना बंद कर दिया, क्योंकि मम्मा ने दरवाज़ा खोला और कहा कि उसके
पास मेरे लिए एक सर्प्राइज़ है: उसने मेरे लिए ट्रेन ख़रीदी है, जिसका मैं कब से सपना देख रहा था. हाँ, और तान्या भी
कुछ नहीं भूलेगी! क्या उसने एक भी बार मुझे धोखा दिया है? नहीं.
मतलब, हमारी मुलाकात के बारे में परेशान होने की कोई ज़रूरत
नहीं है!
जल्दी ही अगस्त
आने वाला है...
ये रहा रास्ता. दूर पर एक
घर है, जहाँ पहले बूढ़ा गडरिया रहता था. हमेशा अपनी बकरियाँ लेकर पहाड़ी पर जाया
करता था. उन्हें कहाँ रखता था (करीब पंद्रह बकरियाँ थीं उसके पास, इससे कम तो बिल्कुल नहीं) – ये बात मैं कभी भी नहीं समझ पाया. जब रास्ता
खतम होगा, तो पेडों का झुरमुट आएगा. वहाँ पहाड़ी-बादामों के
पेड हैं, मगर जैसे अभी हैं, वैसे ही
पहले सिर्फ हरे, कड़े, खट्टे बादाम थे.
हो सकता है, वो कोई जंगली बादाम हों और उन्हें बिल्कुल नहीं
खाना चाहिए? पहले मैं समझता था, कि ये
असली जंगली बादाम हैं क्योंकि झुरमुट तो जंगल ही होता है, चाहे
छोटा ही क्यों न हो; मगर वो बादाम कभी पके ही नहीं, इसलिए मैंने उन्हें कभी खाया ही नहीं. एक बार बस चखा था, इसलिए मुझे पता है, कि – खट्टे हैं.
नानी को अच्छी तरह याद है, कि युद्ध
के पहले क्या-क्या था, मगर मेरा बचपन, जिसके
लिए मैं नानी को बेहद प्यार करता हूँ, उसकी उसे याद ही नहीं
है और वह उसे मम्मा के, मौसी के, बहन
के बचपन के साथ मिला देती है. उसके दिमाग़ में सब गड्डमड्ड हो गया है, उसे सिर्फ वो ही शाम याद है, जब उनके यहाँ डान्स में
घुंघराले बालों वाला साँवला नौजवान आया था और उसने नानी को डान्स के लिए बुलाया.
अट्ठाईस साल बाद वो मेरा नाना बनेगा, मगर फ़िलहाल तो मेरा
उससे कोई वास्ता नहीं है. नानी को अपना शहर याद है, उसका शहर
भी याद है, सहेलियाँ याद हैं, स्टेशन ग्लत्कोव्का
याद है, जहाँ उन सबको, जो मोर्चे पर
नहीं जा सके थे, कराचेवो से निकालकर बसाया गया था, और उसे ये भी पता नहीं है, कि अब – सोवियत संघ नाम
का कोई देश ही नहीं है, उसे तो अभी इस घुंघराले बालों वाले
के साथ डान्स करना है, मगर इस तरह करना है, कि पाव्लिक बुरा न मान जाए, जलने न लगे...
मौत से नानी को डर नहीं
लगता. उसने, हो सकता है, कि उसके बारे कभी संजीदगी से सोचा ही
नहीं था, मगर नाना के गुज़र जाने के बाद, जैसे वो थोड़ा-थोड़ा मौत का इंतज़ार कर रही है.
सब कुछ जो यहाँ है, दिलचस्प
है, - मगर उसके लिए अब ये बात ख़ास नहीं है. डान्सेस, गीत ‘स्टालिन – हमारी सेना की शान, स्टालिन – हमारी जवानी की उड़ान’, जो उनके कोम्सोमोल-ग्रुप
में गाया जाता था, पाव्लिक, तूला वाली
जिंजरब्रेड के डिब्बे में रखे हुए ख़त – उसे इन्हीं के साथ जीना है. मैं ये समझता
हूँ और नानी से और ज़्यादा प्यार करता हूँ. वो खेलने के लिए मुझे बाहर छोड़ने को
तैयार है.
मुझे इससे कोई मतलब नहीं
है, कि ग्यारहवें साल में दीम्का ने स्कूल छोड़ दिया, जिसके
दरवाज़े के पास नीले रंग पे चाभी से ‘सुपर क्लब’ खुरचा हुआ था. हो सकता है, किसी गंभीर कारण से वो घर
बैठ गया हो, मगर इससे मुझे फ़रक नहीं पड़ता, मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ. दीम्का सही में सुपर था, साइकिल की स्पोक्स से ‘गन्स’ बनाता
और एक ही घूँसे से दो पसलियाँ बाहर निकाल देता. कोई बात नहीं अगर उसने स्कूल छोड़
दिया तो. उसने सनकी रूस्ल्या से मुझे बचाया था. रूस्ल्या चाहता था कि मैं नंगे पैर
सिमेन्ट में ‘स्टेच्यू’ हो जाऊँ,
मैं भी ‘स्टेच्यू’ हो
जाता, मैं रूस्ल्या से डरता था. मगर दीम्का वहाँ से जा रहा
था, तो दीम्का की झापड़ से रूस्ल्या ख़ुद ही इस गाढ़ी सिमेन्ट
में जा गिरा, अपने घिनौने थोबड़े समेत गाढ़ी चीज़ में गिरा और
अपमान के कारण अपने ही थूक से उसका दम घुटते-घुटते बचा. तब दीम्का ने मुझे चाय और
केक खिलाई थी, टैक्सी में घुमाया और जैसे बातों-बातों में
एकदम सही-सही कह दिया, कि बुश ही अमेरिका का प्रेसिडेण्ट
बनेगा. उस समय रीगन था, इलेक्शन में अभी पूरे छह महीने थे,
मगर दीम्का को पहले से सब पता था. मतलब, सब
लोग जो कहते थे, कि उसे टेलिपैथी मालूम है, वो सही था. उसके घर में शकर भी भूरी-भूरी थी, इसलिए
नहीं कि जल गई थी, बल्कि इसलिए कि वह अफ्रीका की थी; अब मुझे पक्का मालूम है, कि दीम्का पर यकीन करना
चाहिए.
गर्मियाँ जल्दी ही ख़त्म हो
जाएँगी. अभी जुलाई के आख़िरी दिन ही चल रहे हैं, मगर पैरों के नीचे धरती चरमराने
लगी है, कोई लाल सी, सख़्त सी चीज़
ज़िंदगी में घुसना चाहती है. हर चीज़ पर नज़र रखी जाएगी, आसमान
ज़्यादा घना हो जाएगा, जुलाई वाला वो एहसास भी नहीं रहेगा,
कि हम सब किसी पारदर्शी प्लास्टिक के पैकेट में हैं. और अचानक पता
चलेगा कि +18 डिग्री – काफ़ी गरम है और हम बेकार ही में गर्मियों की बारिश पे
गुस्सा हो रहे थे.
दुकान में जाऊँगा. तरबूज़
ख़रीदूँगा, नानी के साथ रात को खाऊँगा. ये यहाँ, लकड़ी का छोटा
सा शहर और तम्बू था, यहीं पर मुहन ने प्यारी-प्यारी लड़की को ‘किस’ किया था. मुहन तब कितने साल का रहा होगा?
बेशक, अभी मैं जितने का हूँ, उससे कम ही था. मगर मैंने तो आज तक ऐसी सुंदर लड़कियों को ‘किस’ नहीं किया है. मुहन उन्हें क्यों अच्छा लगता था?
वो तो कुछ कहता ही नहीं था. गंभीरता से देखता रहता, वाइन के घूँट लेता, सही में, तंदुरुस्त
था, बिना आस्तीनों वाली कमीज़ पहनता था, उसके मसल्स मुश्किल से आस्तीनों वाले ‘कट्स’ में घुसते थे. दिन में मुहन को लकड़ी छीलने वाली मशीन पर काम करना पड़ता था,
मगर वह काम छोड़कर भाग जाता और हमारे साथ फुटबॉल खेलता.
गालियाँ ऐसी देता, कि ज़मीन
थरथरा जाती थी, मगर महसूस होता था, कि
वो भला इन्सान है. शायद, ऐसे मसल्स वाले के लिए भला इन्सान
होना मुश्किल नहीं है, क्योंकि सब कुछ तुम्हारे हाथ में है!
और अगर ऐसा है, तो शेखी क्यों बघारी जाए?
मिलिट्री-स्टोर तक आ गया.
यहाँ मोटा अंद्रेइ रहता था. सारी बसों के ड्राइवर्स उसे अपनी कैबिन में बिठाते और ज़ोर-ज़ोर
से, और अकड़ से बातें करते, और बाद में मोटा अंद्रेइ ख़ुद
भी बस में काम करने लगा. सब उसे ‘डोनट’ कह कर बुलाते थे. एक बार ल्योशा ख़ाएत्स्की गिटार लाया, और मैंने विक्टर ज़ोय का ‘व्हाइट स्नो’ बजाया. ‘डोनट’ फ़ौरन घर भागा और
रॉक ग्रुप ‘किनो’ के बारे में एक काली,
फ़टी हुई किताब लाकर मुझे दे दी. और, जब दो
महीने बाद मेरे लिए सुहानी सर्दियों वाली नीली जैकेट ख़रीदी गई, तो अपनी पुरानी, चमड़े की जैकेट, जो ईमानदारी से, मुझे कभी भी अच्छी नहीं लगी,
मैं डोनट को देने लगा. मगर उसने नहीं ली. बोला, कि उसे बहुत चुभती है. अजीब बात है, वो सिर्फ चमडे
की है, मगर आम जैकेट्स की ही तरह तो है. मगर अंद्रेइ ने नहीं
ली. मैंने उसे किसी और को दे दिया, याद नहीं है, कि किसे.
तरबूज़ ख़रीदा. चाँद की
रोशनी में पहाड़ियाँ दिखाई दे रही हैं. और गड्ढे भी. अपने प्रवेश द्वार का कोड फिर
से भूल गया (वो हाल ही में बदला है), चाभियाँ हैं नहीं, नानी को फ़ोन करके जगाऊँगा.
और टाइम, बाप रे!
बारह बज चुके हैं!
कहीं अचानक चरवाहा न निकल
पड़े? कल्पना करता हूँ : वो जा रहा है, बेलोमोरिना (सिगरेट
का एक लोकप्रिय ब्राण्ड) के कश लगा रहा है, धरती चरमरा रही
है, गुज़रे ज़माने को याद कर रहा है, मगर
उससे कोई भी उस बारे में नहीं पूछता, बूढ़ा भी ख़ामोश रहता है.
मगर नहीं, नहीं. मगर रास्ते पर कोई भी नहीं है. सिर्फ समय का
ध्यान न रखने वाले फ़ार्म से लौटने वाले ने कार की दूर वाली लाइट जला दी है और ख़ुश
है, कि शहर में बस पहुँचने ही वाला है. संयोग से खट्टे
बादामों वाले झुरमुट पर रोशनी डाल कर वह हाइवे पर निकल जाता है. वहाँ कच्ची सड़क
नहीं है, बल्कि हाल ही में बनाया गया समतल, बिना गड्ढों वाला रास्ता है. ख़ूबसूरत...
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